बांग्लादेश की सड़के क्या अब चुनावी आग की छुट्टी पर हैं

Updated on 2025-12-19T17:42:30+05:30

बांग्लादेश की सड़के क्या अब चुनावी आग की छुट्टी पर हैं

बांग्लादेश की सड़के क्या अब चुनावी आग की छुट्टी पर हैं

बांग्लादेश में पिछले दिनों कट्टर प्रदर्शन और हिंसा का माहौल बन गया है, खासकर तब जब युवा नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत की खबर के बाद एंटी-इंडिया प्रदर्शनों ने देश के कई हिस्सों में तूल पकड़ लिया है। हालात इतने बिगड़े हैं कि राजनीतिक संकट अब प्रशासन के नियंत्रण से बाहर जाने का डर पैदा कर रहे हैं। 

हादी की 12 दिसंबर को ढाका में गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी और वे गंभीर रूप से घायल होकर सिंगापुर के अस्पताल में इलाज के दौरान ज़िन्दा नहीं बच सके। उनकी मौत की खबर फैलते ही ढाका, राजशाही और चटगांव जैसे शहरों में हिंसक प्रदर्शन और नारेबाज़ी शुरू हो गयी। 

प्रदर्शनकारी न सिर्फ़ सड़कों पर उतर आए, बल्कि उन्होंने प्रमुख मीडिया हाउसों जैसे ‘प्रथम आलो’ और ‘द डेली स्टार’ के दफ्तरों को भी निशाना बनाया, तोड़फोड़ और आग लगा दी। कई पत्रकार और कर्मचारियों को इमारत के अंदर फंसे रहने का जोखिम उठाना पड़ा। 

हिंसा केवल अख़बारों तक सीमित नहीं रही। ढाका और चटगांव में भारतीय उच्चायोग कार्यालयों के बाहर पथराव की भी घटनाएँ सामने आईं और भारत-विरोधी नारेबाजी तेज़ हो गयी। प्रदर्शनकारियों ने यहाँ तक कहा कि वे भारत समर्थक राजनीतिक धारणाओं को स्वीकार नहीं करेंगे। 

इन प्रदर्शनों के दौरान कुछ हिंसक तत्वों ने अवामी लीग पार्टी के कार्यालयों पर भी हमले किये, जिससे राजनीतिक तनाव और गहरा गया। सरकार ने तोड़फोड़ और आगजनी रोकने के लिये कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन उबाल कम नहीं हुआ। 

बांग्लादेश के अंतरिम प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए लोगों से संयम रखने और विवादित मुद्दों को हिंसात्मक रूप में नहीं उठाने की अपील की है, साथ ही दोषियों के खिलाफ सख़्त कार्रवाई का भरोसा दिया है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि यह उथल-पुथल आगामी फरवरी 2026 के चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल को और भड़काने का प्रयास हो सकता है। जनता की भावनाएँ इतनी उग्र हैं कि अगर शांतिपूर्ण समाधान नहीं निकला तो स्थिति पूरी तरह आउट-ऑफ-कंट्रोल हो सकती है और देश की कानून-व्यवस्था को भारी झटका पहुँच सकता है। 

यह संकट न सिर्फ़ बांग्लादेश के आंतरिक राजनीतिक समीकरण को प्रभावित कर रहा है, बल्कि भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालने की संभावनाएँ पैदा कर रहा है, क्योंकि प्रदर्शन और नारेबाज़ी दोनों में ही भारत का नाम भावनात्मक रुप से शामिल हो गया है।