चंद्रपुर के जंगलों में इंसान बनाम बाघ: 6 महीने में 22 मौतें, सहमें गांव, सरकार चुप
चंद्रपुर के जंगलों में इंसान बनाम बाघ: 6 महीने में 22 मौतें, सहमें गांव, सरकार चुप
महाराष्ट्र के चंद्रपुर वन क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। जनवरी से जून 2025 के बीच 22 लोग बाघों के हमले में अपनी जान गंवा चुके हैं। बढ़ती आबादी और सिकुड़ते जंगलों के बीच अब इंसान और बाघ एक ही ज़मीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
चंद्रपुर, जहां कभी जंगल और इंसान का सह-अस्तित्व देखा जाता था, अब धीरे-धीरे संघर्ष का मैदान बनता जा रहा है। महाराष्ट्र के इस वन क्षेत्र में फिलहाल करीब 347 बाघ हैं, लेकिन लगातार शहरीकरण, खनन और सड़क निर्माण के कारण उनके रहने की जगह सिमटती जा रही है। परिणामस्वरूप, बाघ गांवों की ओर रुख कर रहे हैं—कभी मवेशी उठाकर ले जाते हैं, तो कभी इंसानों पर हमला कर देते हैं।
सिर्फ 6 महीनों में 22 मौतें इस बात का इशारा हैं कि संकट अब काबू से बाहर हो चुका है। गांव वाले भय के साए में जी रहे हैं। रात में खेत जाना तो दूर, दिन में भी बच्चे अकेले स्कूल नहीं जा पाते। कई लोगों ने घर छोड़ना शुरू कर दिया है, तो कुछ अपनी सुरक्षा के लिए खुद शिकारी हथियार रखने लगे हैं।
वन विभाग के अधिकारी मानते हैं कि बाघों की बढ़ती संख्या और घटती ज़मीन के बीच टकराव अनिवार्य हो गया है। उनका कहना है कि “हम निगरानी बढ़ा सकते हैं, चेतावनी सिस्टम लगा सकते हैं, लेकिन पूरी सुरक्षा देना संभव नहीं है।”
चंद्रपुर की कहानी सिर्फ वन्यजीव संरक्षण की नहीं, बल्कि इंसानी अस्तित्व और व्यवस्था की विफलता की भी है। अगर जल्द ही स्थायी समाधान नहीं निकाला गया,जैसे पुनर्वास, जंगल सीमाएं तय करना और मानव-बाघ संपर्क को कम करना,तो यह संघर्ष और भी भयानक रूप ले सकता है।