नीरज घेवन की फिल्म ‘Homebound’ को Cannes Film Festival में 9 मिनट का स्टैंडिंग ओवेशन, भारतीय सिनेमा के लिए गर्व का क्षण
नीरज घेवन की फिल्म ‘Homebound’ को Cannes Film Festival में 9 मिनट का स्टैंडिंग ओवेशन, भारतीय सिनेमा के लिए गर्व का क्षण
भारतीय फिल्म निर्देशक नीरज घेवन की दूसरी फीचर फिल्म ‘Homebound’ ने 78वें Cannes Film Festival में इतिहास रच दिया। फिल्म को ‘Un Certain Regard’ सेक्शन में प्रीमियर के दौरान दर्शकों से पूरे 9 मिनट तक खड़े होकर ताली बजाने वाला स्टैंडिंग ओवेशन मिला—जो इस बात का प्रतीक है कि भारतीय कहानियों की गूंज अब वैश्विक मंच पर गहराई से सुनी जा रही है।
यह नीरज घेवन की दूसरी फिल्म है जिसे कांस फिल्म फेस्टिवल में जगह मिली है। इससे पहले उनकी पहली निर्देशित फिल्म ‘Masaan’ ने भी 2015 में इसी कैटेगरी में अपनी उपस्थिति दर्ज की थी। मसान, जिसमें ऋचा चड्ढा और विक्की कौशल ने मुख्य भूमिका निभाई थी, को उस समय भी क्रिटिक्स और दर्शकों से भारी सराहना मिली थी।
‘Homebound’: घर की ओर लौटती संवेदनाएं
‘Homebound’ की कहानी उन भावनाओं की पड़ताल करती है जो विस्थापन, आत्म-खोज और रिश्तों की जटिलता से जुड़ी हुई हैं। यह फिल्म एक ऐसे किरदार की यात्रा को दर्शाती है जो अपने अतीत से टकराता है और अपनी जड़ों की ओर लौटता है। घेवन की खासियत—यानी संवेदनशील सामाजिक विषयों को सादगी, गहराई और सम्मान के साथ दिखाना—इस फिल्म में भी बखूबी झलकता है।
फिल्म को न केवल दर्शकों बल्कि अंतरराष्ट्रीय आलोचकों से भी बेहद सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। Un Certain Regard सेक्शन वैसे तो उन फिल्मों के लिए होता है जो नए दृष्टिकोण और अनूठी सिनेमाई भाषा को प्रस्तुत करती हैं—और ‘Homebound’ ने इसमें अपने प्रभाव की अमिट छाप छोड़ी है।
Cannes में भारतीय सिनेमा का गौरव
Cannes Film Festival में किसी भी फिल्म को मिला स्टैंडिंग ओवेशन उसकी भावनात्मक और सिनेमाई ताकत का परिचायक होता है। नीरज घेवन की ‘Homebound’ को मिला 9 मिनट का ओवेशन यह दर्शाता है कि भारतीय सिनेमा अब केवल गाने और मेलोड्रामा तक सीमित नहीं, बल्कि वह सामाजिक जटिलताओं, आत्म-चिंतन और मानवीय भावनाओं की गहराई तक पहुँचने में सक्षम है।
Masaan से Homebound तक: एक निर्देशक की यात्रा
नीरज घेवन का फिल्मी सफर ‘Masaan’ से शुरू होकर ‘Homebound’ तक पहुँचा है। दोनों ही फिल्मों में उन्होंने भारत के सामाजिक ढांचे और व्यक्ति की आंतरिक दुनिया को एक साथ पिरोने की कोशिश की है। Masaan ने बनारस की घाटों पर जीवन और मृत्यु के द्वंद्व को दिखाया था, जबकि Homebound कहीं ज्यादा निजी, फिर भी सार्वभौमिक अनुभवों की पड़ताल करती है।
निष्कर्ष: भारतीय सिनेमा की नई पहचान
‘Homebound’ का Cannes में इस तरह सम्मानित होना न सिर्फ नीरज घेवन की कला का प्रमाण है, बल्कि यह संकेत भी है कि भारत के युवा फिल्मकार अब वैश्विक मंच पर नयी सोच और संवेदनशील विषयों को लेकर अपनी अलग पहचान बना रहे हैं।
यह महज़ एक फिल्म की नहीं, बल्कि एक नई सिनेमाई सोच की जीत है—जो स्थानीय होते हुए भी वैश्विक दिलों को छूने का माद्दा रखती है।
नीरज घेवन और ‘Homebound’ को सलाम—क्योंकि यही तो है भारतीय सिनेमा का नया चेहरा।