UAPA: राष्ट्रीय सुरक्षा का कड़ा कानून, लेकिन विवादों का केंद्र क्यों?
UAPA: राष्ट्रीय सुरक्षा का कड़ा कानून, लेकिन विवादों का केंद्र क्यों?
यूएपीए वह कड़ा कानून है जिसके तहत देश में राष्ट्रीय सुरक्षा और असामाजिक गतिविधियों को रोकने के लिए सरकार को विशेष अधिकार मिलते हैं और इसी के तहत कुछ विवादित मामलों में गिरफ्तारियां भी होती है
Unlawful Activities (Prevention) Act, जिसे सामान्यतः UAPA कहा जाता है, भारत में 30 दिसंबर 1967 को संसद ने पारित किया था. इसका मूल लक्ष्य ‘गैर-कानूनी गतिविधियों’ को रोकना और भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को बचाना है। शुरू में यह कानून राज्यों के खिलाफ अलगाववाद या देश के खिलाफ़ गतिविधियों से निपटने के लिए लाया गया था, लेकिन बाद में इसमें आतंकवादी गतिविधियों को भी शामिल कर दिया गया।
UAPA में समय-समय पर कई संशोधन किए गए हैं। सबसे हाल का और प्रमुख संशोधन 2019 में हुआ, जिसमें सरकार को यह विशेष अधिकार दिया गया कि वह न केवल संगठनों बल्कि व्यक्तियों को भी “आतंकी” घोषित कर सके, बिना किसी औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया के।
इस कानून के तहत —
•सरकार या एजेंसियाँ ऐसे कामों को रोक सकती हैं जो देश की सुरक्षा को खतरे में डालते हैं।
• UAPA के तहत आरोप में गिरफ्तार व्यक्ति को बिना चार्जशीट पेश किए लगभग 180 दिनों तक हिरासत में रखा जा सकता है।
• Bail यानी जमानत मिलना कठिन होता है, क्योंकि कानून में बिंदु ऐसा है कि अदालत को माना जाता है कि आरोपी दोषी नहीं है ये साबित करना मुश्किल होता है।
UAPA सिर्फ “आतंकी संगठन” ही नहीं बल्कि ऐसी गतिविधियाँ भी तय करता है जो भारत के खिलाफ साजिश, हिंसा, हथियार, धन जुटाना, आतंक फैलाना आदि शामिल हैं. इसके तहत दंड में आजीवन कारावास या मौत की सजा तक का प्रावधान है।
आजकल इसी कानून का नाम अक्सर सुना जाता है, क्योंकि दिल्ली दंगों में आरोपित कुछ लोग, जैसे उमर खालिद और शरजील इमाम को इसी UAPA के तहत न्यायिक प्रक्रिया में रखा गया है. सरकार का कहना है कि यह कानून राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से जरूरी है, जबकि आलोचक कहते हैं कि इससे बेकसूरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी हो सकती है और जमानत पाना कठिन होता है।
कुल मिलाकर UAPA भारत का सबसे सख्त सुरक्षा कानूनों में से एक है, जिसका इस्तेमाल आतंक, अस्थिरता और देश के खिलाफ संगठित गतिविधियों को रोकने के लिए किया जाता है।