अंतरिक्ष में चूक कहां हो रही है…
अंतरिक्ष में चूक कहां हो रही है…
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो को दुनिया की सबसे भरोसेमंद स्पेस एजेंसियों में गिना जाता है। कम लागत में सफल मिशन इसकी पहचान रहे हैं। पिछले 9 सालों में इसरो ने कुल 44 सैटेलाइट लॉन्च किए, जिनमें से ज्यादातर सफल रहे। लेकिन इसी दौरान डिफेंस से जुड़े 5 अहम मिशन फेल हुए, जिसने विशेषज्ञों और रणनीतिक हलकों में चिंता बढ़ा दी है।
डिफेंस सैटेलाइट आम कम्युनिकेशन या रिसर्च सैटेलाइट से कहीं ज्यादा जटिल होते हैं। इनमें हाई-रिजॉल्यूशन इमेजिंग, रियल-टाइम डेटा ट्रांसमिशन, एन्क्रिप्शन और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस जैसी अत्याधुनिक तकनीक शामिल होती है। यही वजह है कि इन प्रोजेक्ट्स में गलती की गुंजाइश बेहद कम होती है, लेकिन तकनीकी चुनौती कई गुना ज्यादा होती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि डिफेंस मिशनों में गोपनीयता भी एक बड़ी वजह है। कई बार पूरे सिस्टम का फुल-स्केल टेस्ट नहीं हो पाता, क्योंकि डेटा और टेक्नोलॉजी सीमित दायरे में रखी जाती है। इसका असर लॉन्च और ऑर्बिट में सैटेलाइट की परफॉर्मेंस पर पड़ सकता है। इसके अलावा, इन मिशनों में विदेशी तकनीक या संवेदनशील कंपोनेंट्स का इस्तेमाल भी जोखिम बढ़ाता है।
एक और बड़ी वजह समय का दबाव बताया जा रहा है। डिफेंस जरूरतों को देखते हुए कई प्रोजेक्ट्स को तय समय में पूरा करने का दबाव रहता है। ऐसे में टेस्टिंग फेज छोटा हो जाता है या कुछ सिस्टम को सीमित परिस्थितियों में ही परखा जाता है। बाद में यही छोटी खामियां बड़े फेल्योर का कारण बन जाती हैं।
इसरो के भीतर काम करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि इन असफलताओं को पूरी तरह नाकामी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हर फेल मिशन से जरूरी सबक मिलते हैं, जो अगली उड़ानों को बेहतर बनाते हैं। स्पेस टेक्नोलॉजी में खासकर डिफेंस सेक्टर में ट्रायल और एरर की भूमिका अहम मानी जाती है।
हाल के वर्षों में इसरो ने डिफेंस और सिक्योरिटी एजेंसियों के साथ तालमेल बढ़ाया है। सैटेलाइट डिजाइन, मिशन प्लानिंग और लॉन्च प्रोसेस में सुधार किए जा रहे हैं ताकि भविष्य में जोखिम कम हो सके। इसके साथ ही निजी स्पेस कंपनियों को भी सपोर्टिंग रोल में लाने की तैयारी चल रही है।
कुल मिलाकर, इसरो की उड़ान अभी भी मजबूत है, लेकिन डिफेंस से जुड़े मिशनों ने यह साफ कर दिया है कि अंतरिक्ष की दुनिया में भरोसे के साथ-साथ सतर्कता भी जरूरी है। आने वाले समय में यही चुनौतियां इसरो को और ज्यादा मजबूत बना सकती हैं, बशर्ते उनसे सही सबक लिया जाए।