पाकिस्तान के पुराने F-16 को नई तकनीक क्यों दे रहा अमेरिका
पाकिस्तान के पुराने F-16 को नई तकनीक क्यों दे रहा अमेरिका
अमेरिका ने पाकिस्तान के F-16 लड़ाकू विमानों के लिए करीब 5800 करोड़ रुपये की तकनीक बेचने को मंजूरी दे दी है। इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि यह सौदा ऐसे समय में हुआ है जब पाकिस्तान आर्थिक तौर पर कमजोर है और अमेरिका भारत के साथ भी अपने रक्षा संबंध मजबूत कर रहा है।
अमेरिकी रक्षा सुरक्षा एजेंसी के अनुसार यह डील किसी नए हथियार या मिसाइल सिस्टम की बिक्री नहीं है, बल्कि पाकिस्तान की मौजूदा F-16 फ्लीट को चलाए रखने के लिए टेक्निकल सपोर्ट, स्पेयर पार्ट्स, मेंटेनेंस किट और विभिन्न अपग्रेड पैकेज से जुड़ी है। इसका मतलब है कि अमेरिका पाकिस्तान के पास मौजूद दशकों पुराने F-16 विमानों की सेवा अवधि बढ़ाने में मदद करेगा, ताकि वे आने वाले वर्षों में भी ऑपरेशनल रह सकें।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला अमेरिका की “कंट्रोल्ड एंगेजमेंट” रणनीति का हिस्सा है। यानी वॉशिंगटन पाकिस्तान को पूरी तरह दूर भी नहीं करना चाहता, और उसे अत्याधुनिक हथियार भी नहीं देना चाहता, ताकि दक्षिण एशिया में सैन्य संतुलन भारत के पक्ष में ही बना रहे। इस बीच पाकिस्तान, जो आर्थिक संकट और रक्षा बजट की कमी से जूझ रहा है, पुरानी फ्लीट को चलाने के लिए इसी तरह के पैकेज पर निर्भर है।
भारत इस कदम पर नजर बनाए हुए है। नई दिल्ली लंबे समय से मानता आया है कि पाकिस्तान को मिलने वाला कोई भी सैन्य सपोर्ट सीमा सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े करता है। हालांकि अमेरिका ने साफ किया है कि यह डील पाकिस्तान की “काउंटरटेररिज्म क्षमता” को बनाए रखने के लिए है और इससे क्षेत्रीय संतुलन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
पाकिस्तान के लिए यह मंजूरी राहत की तरह है। उसकी वायुसेना काफी हद तक F-16 पर निर्भर है और बजट संकट के कारण नए जेट खरीदना मुश्किल हो गया है। ऐसे में यह तकनीकी सहायता उसकी एयर पावर को कुछ और साल मजबूत बनाए रखने में मदद करेगी।
कुल मिलाकर, यह सौदा अमेरिकी कूटनीति, पाकिस्तान की मजबूरी और दक्षिण एशिया की रणनीतिक स्थितियों का मिला-जुला परिणाम है। सवाल यह भी है कि क्या पुरानी फ्लीट को तकनीक के सहारे टिकाए रखने की यह कोशिश पाकिस्तान की रक्षा क्षमता को वाकई मजबूत करेगी या सिर्फ अमेरिका की ओर एक और निर्भरता बढ़ाएगी।