क्या ‘ट्रिपल M’ के बिना तेजस्वी की कुर्सी का सपना अधूरा रहेगा
क्या ‘ट्रिपल M’ के बिना तेजस्वी की कुर्सी का सपना अधूरा रहेगा
बिहार की राजनीति में हर चुनाव से पहले एक नया समीकरण बनता है, लेकिन इस बार चर्चा में है ‘ट्रिपल M’ फैक्टर — मुस्लिम, महिला और मोस्ट बैकवर्ड यानी अत्यंत पिछड़ा वर्ग. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर तेजस्वी यादव को सत्ता तक पहुंचना है, तो इन तीन वर्गों का समर्थन उनके लिए जरूरी है।
तेजस्वी यादव के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे इन तीनों तबकों को एक साथ कैसे साधें. मुस्लिम मतदाता पारंपरिक रूप से राजद के समर्थन में रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में जदयू और कांग्रेस के बीच उनका वोट बैंक बंटा है. वहीं, महिलाओं का झुकाव अभी भी नीतीश कुमार की योजनाओं की वजह से जदयू की ओर देखा जाता है।
मोस्ट बैकवर्ड क्लास यानी एमबीसी वर्ग, बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है. यह तबका करीब 20 प्रतिशत आबादी रखता है और कई चुनावों में सत्ता की दिशा तय कर चुका है. नीतीश कुमार ने लंबे समय से इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी है, जबकि तेजस्वी अभी भी इसे अपने पाले में लाने की कोशिश में हैं।
तेजस्वी यादव युवा चेहरा हैं और बेरोजगारी, महंगाई और विकास जैसे मुद्दों को उठाकर उन्होंने युवाओं और शहरी मतदाताओं के बीच पहचान बनाई है. लेकिन बिहार की राजनीति सिर्फ नारों से नहीं चलती—यह जातीय समीकरणों और सामाजिक गठजोड़ पर टिकी है.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर तेजस्वी मुस्लिमों का भरोसा बनाए रखते हुए महिलाओं और मोस्ट बैकवर्ड वर्ग को अपने पक्ष में कर पाते हैं, तो 2025 के चुनाव में तस्वीर बदल सकती है. वरना, ‘ट्रिपल M’ की कमी उनके लिए सत्ता की राह मुश्किल बना सकती है।
अब सवाल यही है—क्या तेजस्वी यादव इन तीनों मोर्चों पर संतुलन साध पाएंगे या नीतीश कुमार का ‘सामाजिक समीकरण’ एक बार फिर भारी पड़ेगा?