हिंसा के बाद मणिपुर में नई सियासी सुलह, जातीय संतुलन की सरकार
हिंसा के बाद मणिपुर में नई सियासी सुलह, जातीय संतुलन की सरकार
मणिपुर की राजनीति में लंबे समय से जारी अस्थिरता के बीच भारतीय जनता पार्टी ने नई सरकार के गठन के साथ एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है— संतुलन, संवाद और भरोसा। राज्य में युमनाम खेमचंद सिंह को मुख्यमंत्री चुना गया है, जो मैतेई समुदाय से आते हैं, जबकि उपमुख्यमंत्री पद कुकी और नगा समुदाय के नेताओं को सौंपने की तैयारी है। इस निर्णय को केवल राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि जातीय तनाव से जूझ रहे राज्य में सामाजिक संतुलन की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
बीजेपी विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से युमनाम खेमचंद सिंह को नेता चुना गया। दिलचस्प बात यह रही कि उनके नाम का प्रस्ताव खुद पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने रखा, जिसे सभी विधायकों ने स्वीकार किया। खेमचंद सिंह का नाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि वे मैतेई समुदाय से होने के बावजूद कुकी बहुल क्षेत्रों में सक्रिय रूप से संवाद करते रहे हैं। राष्ट्रपति शासन के दौरान उन्होंने कुकी राहत शिविरों का दौरा किया था, जिससे उनके प्रति दूसरे समुदायों में भी विश्वास बना ।
सूत्रों के अनुसार, शुरुआत में कुछ अन्य नामों पर विचार हुआ था, लेकिन कुकी विधायकों की सहमति न बनने के कारण पार्टी ने ऐसा चेहरा चुना जो सभी पक्षों को स्वीकार्य हो । खेमचंद सिंह दो बार के विधायक हैं और 2017 से 2022 तक मणिपुर विधानसभा के स्पीकर रह चुके हैं। प्रशासनिक अनुभव और संतुलित छवि उनके पक्ष में गई।
सरकार के गठन में बीजेपी ने जातीय प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी है। नगा समुदाय से लोसी डिखो को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा है, जबकि कुकी समुदाय से भी एक नेता को यही जिम्मेदारी दी जा सकती है। इससे यह संकेत जाता है कि सरकार में सभी प्रमुख समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है।
यह राजनीतिक संतुलन उस पृष्ठभूमि में और महत्वपूर्ण हो जाता है जब मई 2023 में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच भड़की हिंसा में 260 से अधिक लोगों की जान चली गई थी और हजारों लोग बेघर हो गए थे। हालात इतने बिगड़ गए थे कि केंद्र सरकार को राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। पिछले एक वर्ष से अधिक समय से राज्य सीधे केंद्र के नियंत्रण में था । अब राष्ट्रपति शासन हटने से ठीक पहले सरकार बनाने का फैसला यह दर्शाता है कि बीजेपी राज्य में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने के साथ-साथ शांति स्थापित करने की कोशिश कर रही है। 60 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास 37 विधायक हैं, जबकि सहयोगी दलों का भी समर्थन है, जिससे सरकार को स्थिर बहुमत हासिल है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि भरोसा बहाली की प्रक्रिया की शुरुआत है। अगर नई सरकार संवाद, पुनर्वास और सुरक्षा पर प्रभावी कदम उठाती है, तो मणिपुर धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर लौट सकता है। फिलहाल, नई सरकार के शपथ ग्रहण और उसके शुरुआती फैसलों पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।
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