घमंड या रणनीति? ट्रंप ने एक साल में तोड़े 70 वैश्विक रिश्ते

Updated on 2026-01-23T17:43:31+05:30

घमंड या रणनीति? ट्रंप ने एक साल में तोड़े 70 वैश्विक रिश्ते

घमंड या रणनीति? ट्रंप ने एक साल में तोड़े 70 वैश्विक रिश्ते

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में एक बार फिर दुनिया को चौंका दिया है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) से अमेरिका की आधिकारिक विदाई के साथ यह साफ हो गया है कि ट्रंप प्रशासन वैश्विक संस्थाओं से दूरी बनाने की अपनी नीति पर पूरी तरह अडिग है। 22 जनवरी 2026 को अमेरिका ने औपचारिक रूप से WHO की सदस्यता समाप्त कर दी, जिससे 78 साल पुराना रिश्ता खत्म हो गया। 

इस फैसले की शुरुआत ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले ही दिन, 20 जनवरी 2025 को हुई थी। उस दिन जारी एक कार्यकारी आदेश के तहत अमेरिका ने WHO को दी जाने वाली सारी फंडिंग बंद कर दी। जिनेवा स्थित मुख्यालय समेत दुनिया भर के WHO कार्यालयों से अमेरिकी कर्मचारियों और ठेकेदारों को वापस बुला लिया गया। यहां तक कि WHO मुख्यालय के बाहर से अमेरिकी झंडा भी हटा दिया गया। 

ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि WHO ने कोविड-19 महामारी के दौरान गंभीर लापरवाही बरती। संगठन पर राजनीतिक दबाव में काम करने और जरूरी सुधार न करने के आरोप लगाए गए हैं। सरकार ने साफ कहा है कि अमेरिका भविष्य में WHO में दोबारा शामिल नहीं होगा और अब सिर्फ सीमित औपचारिक संपर्क रखा जाएगा, ताकि अलगाव की प्रक्रिया पूरी की जा सके। 

अमेरिका WHO का सबसे बड़ा फंड डोनर रहा है। वह हर साल करीब 111 मिलियन डॉलर सदस्य शुल्क और 570 मिलियन डॉलर से अधिक स्वैच्छिक योगदान देता था। अमेरिका के बाहर निकलने से WHO को भारी आर्थिक झटका लगा है। संगठन के अनुसार अमेरिका पर 130 से 278 मिलियन डॉलर तक का बकाया है, जिसे चुकाने से ट्रंप सरकार ने इनकार कर दिया है। 

विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर सिर्फ WHO तक सीमित नहीं रहेगा। WHO एमपॉक्स, इबोला, पोलियो और भविष्य की महामारियों से निपटने में वैश्विक समन्वय करता है। अमेरिका के हटने से गरीब देशों को वैक्सीन, तकनीकी सहायता और स्वास्थ्य गाइडलाइंस मिलने में दिक्कत आ सकती है। 

जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लॉरेंस गोस्टिन ने इसे “आधुनिक इतिहास का सबसे विनाशकारी स्वास्थ्य नीति निर्णय " बताया है। 

WHO से अलग होना ट्रंप की व्यापक रणनीति का सिर्फ एक हिस्सा है। बीते एक साल में अमेरिका करीब 70 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और समझौतों से बाहर हो चुका है। इनमें 31 संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्थाएं और 35 गैर-यूएन संगठन शामिल हैं। अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते, IPCC, इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी और इंटरनेशनल सोलर अलायंस जैसी संस्थाओं से भी दूरी बना चुका है। 

ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि ये संस्थाएं "वोक एजेंडा" को बढ़ावा देती हैं और अमेरिकी संप्रभुता के खिलाफ काम करती हैं। हालांकि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व खाद्य कार्यक्रम और UNHCR जैसे मंचों में बना रहेगा, जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय हितों के लिए जरूरी माना गया है। 

अब सवाल यह है कि क्या ट्रंप की यह नीति अमेरिका को मजबूत बनाएगी या उसे वैश्विक मंच पर अकेला कर देगी। आने वाले वर्षों में इसका असर सिर्फ अमेरिका पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ेगा। 

यह भी पढ़े 

दुनिया का पहला Al कानून लागू, दक्षिण कोरिया में स्टार्टअप्स परेशान