Bluetooth Earphones से कैंसर का खतरा? जानिए अफवाह और विज्ञान की सच्चाई

Updated on 2026-01-17T12:50:10+05:30

Bluetooth Earphones से कैंसर का खतरा? जानिए अफवाह और विज्ञान की सच्चाई

Bluetooth Earphones से कैंसर का खतरा? जानिए अफवाह और विज्ञान की सच्चाई

आज के डिजिटल दौर में ब्लूटूथ ईयरफोन और ईयरबड्स हमारी रोजमर्रा की जरूरत बन चुके हैं। ऑफिस मीटिंग, ऑनलाइन क्लास, म्यूजिक और कॉल - सब कुछ इन्हीं छोटे डिवाइस पर निर्भर हो गया है। इसी बढ़ते इस्तेमाल के साथ एक डर भी लगातार चर्चा में रहता है कि क्या कान में लगाए जाने वाले ब्लूटूथ ईयरफोन से कैंसर का खतरा हो सकता है। सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट और वीडियो में दावा किया जाता है कि ये डिवाइस सिर के पास "माइक्रोवेव" जैसी रेडिएशन छोड़ते हैं, जो बेहद खतरनाक है। लेकिन वैज्ञानिक तथ्य इस दावे को किस हद तक सही ठहराते हैं?

इस भ्रम को दूर करने के लिए अमेरिका के मिशिगन न्यूरोसर्जरी इंस्टीट्यूट से जुड़े न्यूरोसर्जन डॉ. जय जगन्नाथन ने हाल ही में एक वीडियो के जरिए इस मुद्दे पर स्पष्ट जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ब्लूटूथ ईयरफोन से निकलने वाला रेडिएशन “नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन" की श्रेणी में आता है। इसका मतलब यह है कि यह रेडिएशन डीएनए को नुकसान पहुंचाने या कोशिकाओं में म्यूटेशन करने में सक्षम नहीं होता। कैंसर का खतरा आमतौर पर आयोनाइजिंग रेडिएशन, जैसे एक्स-रे या गामा रे, से जुड़ा होता है।

डॉ. जगन्नाथन के अनुसार, ब्लूटूथ ईयरफोन की तुलना माइक्रोवेव से करना पूरी तरह भ्रामक है। माइक्रोवेव ओवन जिस तरह की हाई पावर रेडिएशन का इस्तेमाल करता है, उसकी तुलना में ईयरबड्स से निकलने वाला सिग्नल बेहद कमजोर होता है। वास्तव में, रिसर्च के मुताबिक ब्लूटूथ ईयरफोन से निकलने वाला रेडिएशन मोबाइल फोन की तुलना में 10 से 400 गुना तक कम हो सकता है।

एक और अहम बात यह है कि अब तक दुनिया भर में हुए वैज्ञानिक अध्ययनों में ब्लूटूथ ईयरफोन और कैंसर के बीच कोई सीधा और ठोस संबंध साबित नहीं हुआ है। यहां तक कि मोबाइल फोन, जिनका रेडिएशन स्तर ईयरफोन से कहीं ज्यादा होता है, उनके मामले में भी कैंसर को लेकर निर्णायक सबूत नहीं मिल पाए हैं।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ईयरफोन का इस्तेमाल बिल्कुल बेफिक्र होकर किया जाए। लंबे समय तक लगातार ईयरफोन लगाए रखने से कानों में दर्द, सुनने की क्षमता पर असर और सिरदर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि मध्यम वॉल्यूम पर ईयरफोन का इस्तेमाल करें, बीच-बीच में ब्रेक लें और सोते समय इन्हें कानों में न रखें।

निष्कर्ष यही है कि ब्लूटूथ ईयरफोन से कैंसर होने का डर फिलहाल वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित नहीं है। सही और संतुलित उपयोग के साथ ये डिवाइस सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन किसी भी टेक्नोलॉजी की तरह इनका समझदारी से इस्तेमाल करना ही सबसे बेहतर तरीका है।

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