अजित पवार के निधन बाद अटका एनसीपी विलय, बढ़ी सियासी असमंजस
अजित पवार के निधन बाद अटका एनसीपी विलय, बढ़ी सियासी असमंजस
महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार के निधन के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है- क्या राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दोनों गुटों का विलय अब भी संभव है? जिन हालातों में यह विलय लगभग तय माना जा रहा था, उन्हीं परिस्थितियों में अब असमंजस और मतभेद साफ दिखाई देने लगे हैं।
अजित पवार के जीवित रहते एनसीपी के दोनों गुटों- शरद पवार गुट और अजित पवार गुट के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी थी। सूत्रों के मुताबिक, फरवरी महीने में संयुक्त बैठक बुलाकर औपचारिक विलय की घोषणा की तैयारी भी थी। शरद पवार गुट के नेताओं का दावा है कि खुद अजित पवार इस विलय को लेकर सकारात्मक थे और 12 फरवरी को इसका ऐलान होना था।
हालांकि, अजित पवार के निधन के बाद राजनीतिक हालात तेजी से बदल गए। शरद पवार गुट अब भी विलय की उम्मीद लगाए बैठा है, लेकिन महायुति गठबंधन में शामिल अजित पवार गुट की ओर से अब तक कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यही कारण है कि जो विलय लगभग फाइनल माना जा रहा था, उस पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं।
शनिवार को शरद पवार की बारामती में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस ने भी इस असमंजस को और गहरा कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि विलय की घोषणा अजित पवार को करनी थी और उन्हें सुनेत्रा पवार के उपमुख्यमंत्री बनने की किसी भी तरह की जानकारी नहीं है। इस बयान से संकेत मिलता है कि अजित पवार गुट अब शरद पवार को फैसलों में शामिल नहीं कर रहा है।
शरद पवार गुट के नेता राजेश टोपे और अनिल देशमुख जैसे वरिष्ठ नेता खुले तौर पर विलय के समर्थन में बयान दे चुके हैं। वहीं अजित पवार गुट के नेता इस मुद्दे पर या तो चुप हैं या फिर टालमटोल वाला जवाब दे रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे और छगन भुजबल ने साफ कहा है कि फिलहाल पार्टी के सामने सबसे अहम मुद्दा नेतृत्व और संगठनात्मक संतुलन है, न कि विलय।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, विलय से सबसे बड़ी परेशानी मंत्रिमंडल संतुलन को लेकर है। अगर शरद पवार गुट का विलय होता है तो उनके वरिष्ठ नेताओं को मंत्री पद देना पड़ेगा। इसका मतलब यह होगा कि अजित पवार गुट के मौजूदा मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ सकता है, जिससे अंदरूनी असंतोष बढ़ने की पूरी संभावना है।
इसके अलावा, शरद पवार गुट में कई बड़े चेहरे हैं, जिनके आने से अजित पवार गुट के नेताओं का राजनीतिक कद कमजोर हो सकता है। यही वजह मानी जा रही है कि अजित गुट फिलहाल विलय को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं दिखा रहा। बीजेपी के लिए यह स्थिति फायदेमंद हो सकती है, क्योंकि दोनों गुटों के एक होने से एनडीए की ताकत बढ़ेगी। हालांकि बीजेपी इस मुद्दे पर सीधे दबाव बनाती नहीं दिख रही, लेकिन राजनीतिक संतुलन साधने की भूमिका जरूर अहम रहेगी। कुल मिलाकर, अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी का विलय जिस तेजी से होने की उम्मीद थी, वह अब ठहराव में बदलती दिख रही है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह ठहराव अस्थायी है या फिर एनसीपी के दोनों गुट अपनी-अपनी राह पर ही आगे बढ़ेंगे।
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