कौन हैं रंगाधारी, क्यों शादीशुदा बेटियों को प्रसाद नहीं मिलता

Updated on 2026-02-20T12:31:13+05:30

कौन हैं रंगाधारी, क्यों शादीशुदा बेटियों को प्रसाद नहीं मिलता

कौन हैं रंगाधारी, क्यों शादीशुदा बेटियों को प्रसाद नहीं मिलता

बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वी गांवों में पूजा-पाठ की परंपरा शहरों से काफी अलग होती है. यहां मंदिरों में मूर्तियों की जगह कई घरों में मिट्टी की छोटी-छोटी पिंडियों की पूजा की जाती है.

एक ब्राह्मण परिवार के गोसाई घर में देवी-देवताओं की तस्वीरों की बजाय मिट्टी की पिंडियां रखी थीं. एक पिंडी को शीतला माता माना जाता था, जबकि पास में बनी मजार जैसी आकृति को ‘पीर बाबा’ का स्थान बताया गया. ग्रामीण इलाकों में हिंदू परिवारों द्वारा स्थानीय पीर या बाबा को घर का संरक्षक मानना आम बात है.

पूजा घर के एक कोने में ‘रंगाधारी’ नाम की एक पिंडी भी रखी थी, जिस पर काला तिलक लगा होता था. परिवार के बुजुर्गों के अनुसार, रंगाधारी कोई भूत नहीं, बल्कि घर, खेत और परिवार की रक्षा करने वाली संरक्षक आत्मा माने जाते हैं.

मान्यता है कि परेशानी, बीमारी या फसल खराब होने पर लोग रंगाधारी से प्रार्थना करते हैं और प्रसाद चढ़ाते हैं. हालांकि इस प्रसाद को शादीशुदा बेटियों को नहीं दिया जाता, क्योंकि माना जाता है कि रंगाधारी उसी घर और वंश के रक्षक होते हैं.

ग्रामीण भारत में देवी-देवताओं के साथ स्थानीय संत, पीर बाबा और ग्राम देवताओं की पूजा की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है. गोसाई घर जैसे पूजा स्थल परिवार की आस्था, परंपरा और इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं.

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