मुंबई की सत्ता किसके हाथ आई
मुंबई की सत्ता किसके हाथ आई
मुंबई नगर निगम चुनाव 2026 के नतीजों ने महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा संदेश दे दिया है। इस बार बीएमसी की लड़ाई सिर्फ स्थानीय निकाय तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे 2024 और 2029 की राजनीति का सेमीफाइनल माना जा रहा था। नतीजों में बीजेपी और एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना ने बढ़त बनाते हुए उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की जोड़ी को पीछे छोड़ दिया।
चुनाव परिणामों के शुरुआती रुझानों से ही साफ हो गया था कि शिंदे-फडणवीस की जोड़ी ने जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ बनाई है। वार्ड स्तर पर संगठन, उम्मीदवार चयन और आक्रामक प्रचार का असर सीधे वोटों में दिखा। बीजेपी और शिंदे गुट ने मिलकर कई ऐसे इलाकों में जीत दर्ज की, जो लंबे समय से ठाकरे खेमे का गढ़ माने जाते थे।
उद्धव ठाकरे की शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को इस चुनाव में उम्मीद के मुताबिक समर्थन नहीं मिला। राज ठाकरे की एमएनएस भी प्रभाव छोड़ने में नाकाम रही। मराठी अस्मिता और स्थानीय मुद्दों को जोर-शोर से उठाने के बावजूद वोटों का बंटवारा विपक्ष के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।
इस चुनाव का एक बड़ा राजनीतिक संकेत नवाब मलिक के परिवार से जुड़ा भी देखने को मिला। नवाब मलिक के भाई चुनाव हार गए, जिसे एनसीपी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। यह हार सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि पार्टी की मुंबई में कमजोर होती पकड़ की तरफ इशारा करती है।
बीएमसी जैसे देश के सबसे अमीर नगर निगम पर नियंत्रण राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है। यहां जीत का मतलब सिर्फ प्रशासनिक ताकत नहीं, बल्कि मुंबई जैसे महानगर में राजनीतिक भरोसे की मुहर भी होता है। शिंदे-फडणवीस खेमे के लिए यह जीत आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिहाज से मनोबल बढ़ाने वाली है।
अब साफ है कि मुंबई की राजनीति में समीकरण बदल रहे हैं। जहां एक तरफ सत्ता पक्ष अपनी जीत को जनसमर्थन बता रहा है, वहीं विपक्ष के सामने आत्ममंथन की चुनौती खड़ी हो गई है। बीएमसी के ये नतीजे आने वाले समय में महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा और दशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं।
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