Last Updated Jan - 29 - 2026, 05:54 PM | Source : Fela News
EU से ऐतिहासिक समझौते के बाद भारत अब अमेरिका के साथ रणनीतिक और व्यापारिक रिश्तों को नई दिशा देने की तैयारी में है, जयशंकर का दौरा बेहद अहम माना जा रहा है।
यूरोपियन यूनियन के साथ बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के बाद भारत की कूटनीतिक रणनीति अब अमेरिका की ओर बढ़ती दिख रही है। इसी कड़ी में विदेश मंत्री एस. जयशंकर अगले हफ्ते अमेरिका का दौरा कर सकते हैं। यह दौरा ऐसे समय में प्रस्तावित है, जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक मतभेदों, टैरिफ विवादों और सप्लाई चेन को लेकर तनाव की खबरें सामने आ रही हैं। ऐसे में जयशंकर की यह यात्रा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत-अमेरिका रिश्तों के लिए बेहद निर्णायक मानी जा रही है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर अमेरिका में आयोजित होने वाली 'क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल' बैठक में हिस्सा लेने जा सकते हैं। यह हाई लेवल बैठक वॉशिंगटन डीसी में होगी, जिसकी मेजबानी अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो करेंगे। यह पहली बार होगा जब इस मंच पर इतने बड़े स्तर पर देशों को एक साथ लाकर अहम खनिजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर चर्चा की जाएगी।
क्रिटिकल मिनरल्स जैसे लिथियम, कोबाल्ट और निकल आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, रिन्यूएबल एनर्जी, सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री और डिफेंस सिस्टम्स इन पर निर्भर हैं। चीन के दबदबे को देखते हुए अमेरिका और उसके सहयोगी देश इन खनिजों की सप्लाई चेन को सुरक्षित और विविध बनाना चाहते हैं। भारत इस रणनीति में एक अहम भागीदार बनकर उभर रहा है।
जयशंकर का यह दौरा ऐसे वक्त हो रहा है, जब भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर खींचतान चल रही है। अमेरिकी टैरिफ नीति, भारतीय निर्यात पर दबाव और कुछ रणनीतिक मसलों पर मतभेद रिश्तों में तल्खी का कारण बने हैं। माना जा रहा है कि अगर जयशंकर अमेरिका जाते हैं, तो यह दोनों देशों के बीच संवाद बहाल होने और रिश्तों में आई ठंडक को दूर करने का स्पष्ट संकेत होगा।
सूत्रों के अनुसार, इस दौरे के दौरान जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री के बीच द्विपक्षीय बातचीत भी हो सकती है। इसमें व्यापार, डिफेंस, टेक्नोलॉजी, इंडो-पैसिफिक रणनीति और वैश्विक भू-राजनीति जैसे मुद्दों पर चर्चा की संभावना है। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच संभावित बैठक की रूपरेखा पर भी बातचीत हो सकती है।
गौर करने वाली बात यह है कि भारत ने हाल ही में यूरोपियन यूनियन के साथ जिस तरह का व्यापक एफटीए किया है, उसने वैश्विक मंच पर भारत की सौदेबाजी की ताकत को और मजबूत किया है। इस डील से भारतीय उद्योगों को बड़ा बाजार, कम टैरिफ और निवेश के नए अवसर मिले हैं। ऐसे में अमेरिका के साथ बातचीत में भी भारत ज्यादा आत्मविश्वास के साथ अपनी शर्तें रख सकता है।
कुल मिलाकर, एस. जयशंकर का संभावित अमेरिका दौरा सिर्फ एक कूटनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत अब वैश्विक शक्ति संतुलन में खुद को निर्णायक भूमिका में स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। आने वाले हफ्ते भारत-अमेरिका रिश्तों के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं।
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