Last Updated Jan - 09 - 2026, 03:56 PM | Source : Fela News
ईडी कार्रवाई को लेकर ममता सरकार के सख्त रुख ने ऐसा राजनीतिक माहौल बना दिया है, जहां राष्ट्रपति शासन की बहस फिर सतह पर आ गई है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र सरकार के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया है। हालिया घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या बंगाल राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है। संविधान की धारा 356 का जिक्र अब सिर्फ टीवी बहसों तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि सियासी रणनीति का हिस्सा बनता दिख रहा है।
मामला तब और गरमा गया जब ईडी की रेड के दौरान राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसी के बीच तनातनी की खबरें सामने आईं। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र सरकार ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक बदले के लिए कर रही है। ममता बनर्जी ने साफ कहा कि राज्य में कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है और किसी भी एजेंसी को मनमानी की इजाजत नहीं दी जाएगी।
दूसरी ओर, भाजपा का आरोप है कि ममता सरकार जांच में बाधा डाल रही है और केंद्रीय एजेंसियों को काम नहीं करने दिया जा रहा। पार्टी नेताओं का कहना है कि अगर संवैधानिक संस्थाओं को रोका गया और कानून-व्यवस्था बिगड़ी, तो यह धारा 356 के दायरे में आ सकता है। इसी बयानबाजी ने राष्ट्रपति शासन की अटकलों को हवा दे दी है।
संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति शासन कोई आसान या त्वरित फैसला नहीं होता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी होता है कि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह विफल हो गई है। सिर्फ राजनीतिक टकराव या एजेंसियों की कार्रवाई के आधार पर धारा 356 लगाना कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। फिर भी, केंद्र और राज्य के बीच बढ़ता तनाव स्थिति को जटिल बना रहा है।
बंगाल में पहले भी राष्ट्रपति शासन का इतिहास रहा है, लेकिन मौजूदा हालात उससे अलग बताए जा रहे हैं। ममता बनर्जी की सरकार को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल है और प्रशासनिक नियंत्रण भी पूरी तरह राज्य के हाथ में है। ऐसे में राष्ट्रपति शासन की संभावना फिलहाल राजनीतिक दबाव की रणनीति ज्यादा लगती है, न कि तत्काल होने वाला कदम।
हालांकि, जिस तरह से बयानबाजी तेज हो रही है और हर कार्रवाई को संवैधानिक संकट से जोड़ा जा रहा है, उससे माहौल और संवेदनशील हो गया है। आने वाले दिनों में ईडी की जांच किस दिशा में जाती है और ममता सरकार का रुख कितना सख्त रहता है, यही तय करेगा कि यह बहस सिर्फ चर्चा तक सीमित रहेगी या सच में किसी बड़े राजनीतिक फैसले की जमीन तैयार हो रही है।