Last Updated Nov - 24 - 2025, 01:30 PM | Source : Fela News
हिडमा की मौत के बाद नक्सलियों द्वारा सामूहिक सरेंडर की चिट्ठी से सुरक्षा एजेंसियों में हलचल बढ़ी।
छत्तीसगढ़ से महाराष्ट्र तक सुरक्षा एजेंसियों में हलचल बढ़ गई है। हिडमा के खात्मे के बाद कई नक्सली गुटों में सरेंडर की चर्चा तेज हो गई है। हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को भेजी गई एक चिट्ठी ने इस पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया। इसमें नक्सलियों ने हथियार डालने की इच्छा जताई है और बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण की बात कही है।
चिट्ठी में नक्सलियों ने लगातार बढ़ रहे सुरक्षा दबाव और नेतृत्व संकट का जिक्र किया है। हिडमा की मौत के बाद जंगलों में मौजूद कई कैडर खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। पुलिस की लगातार सर्च ऑपरेशन और ग्राउंड-लेवल पर बदलती रणनीति के कारण नक्सली अब पुराने ढांचे में काम नहीं कर पा रहे। यही वजह है कि वे सरकार के सामने एक सामूहिक सरेंडर का रास्ता तलाश रहे हैं।
नक्सलियों की ओर से भेजी गई चिट्ठी में यह दावा किया गया है कि वे मुख्यधारा में वापस आना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें राज्य से सुरक्षा, पुनर्वास और कानूनी मामलों में राहत की गारंटी चाहिए। सूत्रों के मुताबिक, इस चिट्ठी की जांच अब कई एजेंसियां कर रही हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि दावा कितना विश्वसनीय है और इसके पीछे असल मंशा क्या है।
राज्य सरकार की ओर से इस पत्र को लेकर आधिकारिक बयान तो नहीं आया है, लेकिन सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि यदि नक्सल गुट सच में सरेंडर करना चाहते हैं, तो यह कई दशकों के हिंसक दौर के बाद एक बड़ा बदलाव होगा। महाराष्ट्र और पड़ोसी राज्यों में पिछले कुछ महीनों में जिन ऑपरेशनों में बड़े नक्सली कमांडर मारे गए या पकड़े गए, उसने भी संगठन की कमर तोड़ी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नेतृत्व खत्म होने के बाद नक्सली कैडरों में भरोसे का संकट गहरा गया है। कई युवा सदस्य संगठन छोड़कर लौटना चाहते हैं क्योंकि अब जंग लड़ने की प्रेरणा, संसाधन और सुरक्षा—सब कुछ कमजोर पड़ चुका है। वहीं, सरकार इस समय किसी जल्दबाज़ी में फैसला लेने के मूड में नहीं दिख रही, क्योंकि सामूहिक आत्मसमर्पण का दावा सही साबित हुआ तो यह एक बड़ी सफलता हो सकती है, लेकिन अगर यह रणनीतिक झांसा हुआ तो सुरक्षा जोखिम भी बढ़ सकता है।
फिलहाल सभी एजेंसियां पत्र की प्रामाणिकता, भेजने वाले समूह और सरेंडर की इच्छा रखने वाले कैडरों की संख्या का पता लगाने में जुटी हैं। अगर सब कुछ सच साबित होता है, तो अगले कुछ हफ्तों में नक्सल प्रभावित इलाकों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।