Last Updated Jan - 09 - 2026, 04:17 PM | Source : Fela News
संसद के ऊपरी सदन में एक लंबे कार्यकाल के बाद अब उपसभापति पद को लेकर नई राजनीतिक हलचल शुरू हो गई है।
राज्यसभा के मौजूदा उपसभापति हरिवंश का कार्यकाल धीरे-धीरे अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ता दिख रहा है। ऐसे में यह सवाल सियासी गलियारों में गूंजने लगा है कि क्या इस साल राज्यसभा को नया उपसभापति मिलने वाला है। हरिवंश 2020 से इस अहम पद पर हैं और उन्होंने कई संवेदनशील और हंगामेदार सत्रों को संभाला है, लेकिन अब उनका कार्यकाल पूरा होने के साथ ही नए नामों पर चर्चा तेज हो गई है।
हरिवंश जनता दल यूनाइटेड से आते हैं और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी माने जाते हैं। एनडीए सरकार के दौरान उनका उपसभापति बनना भाजपा और जेडीयू के बीच संतुलन का संकेत माना गया था। विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों के लिए वे एक शांत लेकिन सख्त पीठासीन अधिकारी के रूप में पहचाने गए। कई बार उन्होंने विपक्ष के हंगामे के बीच भी सदन की कार्यवाही को नियंत्रित रखा, तो कुछ मौकों पर उनके फैसलों को लेकर विवाद भी हुआ।
अब राजनीतिक हालात पहले जैसे नहीं हैं। जेडीयू और भाजपा के रिश्तों में उतार-चढ़ाव रहा है और केंद्र की राजनीति में समीकरण बदलते रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा इस बार उपसभापति पद पर अपना उम्मीदवार उतारेगी या फिर किसी नए सहयोगी को मौका दिया जाएगा। राज्यसभा का उपसभापति पद संवैधानिक रूप से बेहद अहम है, क्योंकि सभापति की अनुपस्थिति में वही सदन का संचालन करता है।
सूत्रों के मुताबिक, सत्ता पक्ष के भीतर नए नामों पर अनौपचारिक चर्चा शुरू हो चुकी है। कुछ वरिष्ठ सांसदों के नाम सामने आ रहे हैं, जो संगठन और सरकार दोनों में संतुलन बना सकें। वहीं, विपक्ष भी इस पद को लेकर अपनी रणनीति पर नजर बनाए हुए है, क्योंकि उपसभापति की भूमिका सदन की कार्यवाही और विपक्ष की आवाज के लिए भी अहम मानी जाती है।
हरिवंश के भविष्य को लेकर भी अटकलें हैं। कुछ लोगों का मानना है कि उन्हें दोबारा मौका मिल सकता है, जबकि कुछ का कहना है कि बदलते राजनीतिक समीकरण उनके रास्ते को मुश्किल बना सकते हैं। अब तक इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन संसद के अगले सत्र से पहले तस्वीर साफ होने की संभावना जताई जा रही है।
कुल मिलाकर, राज्यसभा में उपसभापति का पद सिर्फ औपचारिक नहीं बल्कि सत्ता संतुलन का प्रतीक होता है। हरिवंश की पारी अगर सच में विराम की ओर है, तो यह बदलाव सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं बल्कि राजनीतिक रणनीति का भी संकेत होगा। अब देखना यह है कि इस साल संसद के इस अहम पद पर किसका नाम मुहर लगवाता है।