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LinkedIn पोस्ट में उद्यमी ने की 1970 बनाम 2025 के मिडल क्लास जीवन की तुलना, बोला– “अब ज़िंदगी सेट नहीं, सिर्फ़ सर्वाइव हो रही है”

LinkedIn पोस्ट में उद्यमी ने की 1970 बनाम 2025 के मिडल क्लास जीवन की तुलना, बोला– “अब ज़िंदगी सेट नहीं, सिर्फ़ सर्वाइव हो रही है”

Last Updated Jun - 21 - 2025, 12:55 PM | Source : Fela News

एक उद्यमी की वायरल LinkedIn पोस्ट में 1970 और 2025 के मिडल क्लास जीवन की तुलना करते हुए कहा गया– आज की ज़िंदगी 'सेट' नहीं, सिर्फ़ 'सर्वाइव' हो रही है।
LinkedIn पोस्ट में उद्यमी ने की 1970 बनाम 2025 के मिडल क्लास जीवन की तुलना, बोला–
LinkedIn पोस्ट में उद्यमी ने की 1970 बनाम 2025 के मिडल क्लास जीवन की तुलना, बोला–

दिल्ली के उद्यमी हिमांशु कालरा की एक लिंक्डइन पोस्ट ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। उन्होंने भारत में मिडल क्लास पुरुषों के जीवन की तुलना 1970 और 2025 के बीच की, और सवाल उठाया कि क्या देश की आर्थिक तरक्की लोगों की व्यक्तिगत स्थिरता और मानसिक शांति की कीमत पर हो रही है?

 

Binoloop के फाउंडर हिमांशु कालरा ने अपनी पोस्ट में लिखा, “1970 में एक मिडल क्लास व्यक्ति का जीवन एक सुरक्षित और तयशुदा रास्ते पर चलता था — कॉलेज जाओ, डिग्री लो, एक स्किल सीखो, नौकरी पाओ, अच्छा वेतन मिले, घर बनाओ, शादी करो, तीन बच्चे हों, और पांच लोगों का परिवार पालो — ज़िंदगी सेट थी।”

 

लेकिन 2025 की तस्वीर उन्होंने इससे बिल्कुल उलट बताई। कालरा ने लिखा कि आज की पीढ़ी कॉलेज में दाखिले के लिए लाखों से प्रतियोगिता करती है, और पढ़ाई खत्म होते ही एजुकेशन लोन का बोझ लेकर बाहर आती है। एक नहीं, कई स्किल्स सीखनी पड़ती हैं — जो हर दो साल में पुरानी हो जाती हैं। जॉब के लिए कम्पटीशन भी पहले से कहीं ज़्यादा है। ऊपर से महंगाई, कम इन्क्रीमेंट और लगातार ‘अपस्किलिंग’ का दबाव। शादी के बाद एक ही बच्चा होता है, और दोनों पार्टनर काम करते हैं, सिर्फ़ ज़िंदगी को संतुलन में रखने के लिए। मानसिक स्वास्थ्य? “खुद ही संभाल लो,” कालरा ने लिखा। उन्होंने पोस्ट का अंत एक कड़वे सच के साथ किया — “हां, इकॉनमी तो बूम कर रही है।”

 

पोस्ट ने छेड़ी जनचेतना और बहस

 

कालरा की पोस्ट पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं। एक यूज़र ने लिखा, “आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। लेकिन इसमें एक और अहम वजह है — बढ़ती जनसंख्या। आज हर चीज़ के लिए एंट्रेंस एग्ज़ाम है, फिर चाहे वह कॉलेज हो या नौकरी। जनसंख्या ही सब कुछ जड़ में है।”

 

एक अन्य यूज़र ने लिखा, “दोनों पक्षों को हर दिन देखता हूं। हां, आज ज़्यादा मौके हैं, लेकिन ज़्यादा उलझन भी है। विकल्प ज़्यादा हैं, पर स्पष्टता कम। 1970 में सफलता सीधी थी, 2025 में वह बार-बार सीखी और गढ़ी जाती है। अब करियर गाइडेंस का मतलब सिर्फ़ नौकरी नहीं, बल्कि ऐसे स्किल्स देना है जो इस लगातार बदलती दुनिया में ज़िंदा रख सकें।”

 

इस बहस ने एक अहम सवाल सामने रखा है — क्या आज का युवा सिर्फ़ "सर्वाइव" करने के लिए जूझ रहा है, जबकि 50 साल पहले लोग “सेट” ज़िंदगी जीते थे?

 

देश की तेज़ रफ्तार विकास दर के बीच ये पोस्ट एक आईना है, जिसमें आर्थिक तरक्की और व्यक्तिगत संघर्ष का टकराव साफ़ देखा जा सकता है।

 

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