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ना इंसान, ना जानवर... फिर कैसे चलते हैं डेथ वैली के पत्थर ?

ना इंसान, ना जानवर... फिर कैसे चलते हैं डेथ वैली के पत्थर ?

Last Updated Jan - 29 - 2026, 05:45 PM | Source : Fela News

अमेरिका की डेथ वैली में सूखी झील पर अपने-आप सरकते पत्थर वर्षों तक रहस्य बने रहे। अब वैज्ञानिकों ने बताया कि ये चट्टानें कैसे और क्यों चलती हैं।
फिर कैसे चलते हैं डेथ वैली के पत्थर ?
फिर कैसे चलते हैं डेथ वैली के पत्थर ?

दुनिया के सबसे रहस्यमयी प्राकृतिक अजूबों में अमेरिका की डेथ वैली का नाम खास तौर पर लिया जाता है। यहां एक ऐसी घटना देखने को मिलती है, जिसे देखकर पहली नजर में यकीन करना मुश्किल हो जाता है। सूखी झील की सपाट जमीन पर भारी-भरकम पत्थर बिना किसी इंसानी या जानवर की मदद के अपने-आप खिसकते नजर आते हैं। इतना ही नहीं, ये पत्थर अपने पीछे लंबी-लंबी लकीरें भी छोड़ जाते हैं, जो किसी अदृश्य ताकत की कहानी कहती हैं। 

यह अजीबोगरीब जगह डेथ वैली नेशनल पार्क के भीतर स्थित रेसट्रैक प्लाया नाम की सूखी झील है। दशकों तक यहां मौजूद पत्थरों को सरकते हुए किसी ने अपनी आंखों से नहीं देखा था, लेकिन जमीन पर बनी लकीरों से साफ पता चलता था कि वे अपनी जगह बदल चुके हैं। इसी वजह से इन्हें "स्लाइडिंग स्टोन्स" या "सेलिंग स्टोन्स" कहा जाने लगा। 

लंबे समय तक वैज्ञानिक इस सवाल से जूझते रहे कि आखिर इतने भारी पत्थर रेगिस्तान में कैसे हिल सकते हैं। न वहां कोई जानवर पाए गए, न इंसानों के कदमों के निशान मिले और न ही इतनी तेज़ आंधी दर्ज हुई, जो चट्टानों को धकेल सके। कभी चुंबकीय शक्ति को वजह बताया गया, तो कभी असाधारण हवाओं को, लेकिन कोई भी सिद्धांत पूरी तरह साबित नहीं हो पाया। 

आखिरकार साल 2013 और 2014 में वैज्ञानिकों ने इस रहस्य को सुलझाने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया। शोधकर्ताओं ने कुछ पत्थरों पर जीपीएस डिवाइस लगाए, मौसम मापने वाले उपकरण स्थापित किए और टाइम लैप्स कैमरे लगाए। पहली बार पत्थरों की असली हरकत कैमरे में कैद हुई। 

रिसर्च से पता चला कि यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि प्रकृति की बेहद सटीक परिस्थितियों का नतीजा है। बारिश के बाद रेसट्रैक प्लाया की सूखी जमीन पर पानी की एक पतली परत जम जाती है। रात के समय जब तापमान गिरता है, तो यह पानी जमकर बेहद पतली बर्फ की परत बना लेता है। सुबह सूरज निकलने पर यह बर्फ टूटकर बड़े-बड़े टुकड़ों में बदल जाती है। 

अब यहां हल्की-सी हवा भी अहम भूमिका निभाती है। हवा इन बर्फीले टुकड़ों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाती है। यही बर्फ के टुकड़े पास में पड़े पत्थरों को हल्का-सा धक्का देते हैं। नीचे कीचड़ जैसी नरम सतह होने के कारण पत्थर बहुत धीमी गति से खिसकने लगते हैं। यह पूरी प्रक्रिया इतनी शांत होती है कि आसपास मौजूद व्यक्ति को इसका एहसास तक नहीं होता। यह घटना हर साल नहीं होती। इसके लिए सही मात्रा में बारिश, रात में ठंड और दिन में हल्की हवा का एक साथ होना जरूरी है। डेथ वैली जैसे कठोर वातावरण में ऐसा संयोग बहुत कम बनता है। यही वजह है कि कई बार वर्षों तक पत्थर अपनी जगह से नहीं हिलते। 

आज यह जगह वैज्ञानिकों के साथ-साथ पर्यटकों और फोटोग्राफरों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन चुकी है। स्लाइडिंग स्टोन्स यह साबित करते हैं कि प्रकृति के रहस्य हमेशा डरावने या अलौकिक नहीं होते, बल्कि सही नजर और समझ से हर रहस्य का वैज्ञानिक जवाब मिल सकता है। 

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