Last Updated Apr - 10 - 2025, 11:31 AM | Source : Fela News
बलात्कार और हत्या के दोषी राम रहीम को 13वीं बार पैरोल मिलने पर सवाल उठ रहे हैं। उसकी बार-बार रिहाई पर विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने कानून व्यवस्था पर गंभीर चिंता
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख और बलात्कार व हत्या जैसे गंभीर मामलों में दोषी गुरमीत राम रहीम को हरियाणा सरकार ने एक बार फिर 21 दिन की पैरोल पर रिहा कर दिया है। बुधवार सुबह राम रहीम को रोहतक की सुनारिया जेल से बाहर लाया गया।
राम रहीम को इस तरह की छूट पहले भी मिलती रही है, जिससे सरकार पर सवाल उठते रहे हैं। यह 13वीं बार है जब अक्टूबर 2020 से अब तक उसे पैरोल या फरलो पर छोड़ा गया है।
लगातार मिल रही है रिहाई, विपक्ष ने उठाए सवाल
चौंकाने वाली बात यह है कि सिर्फ पिछले साल 20 जनवरी से अब तक राम रहीम को कुल 142 दिन जेल से बाहर रहने की अनुमति दी जा चुकी है।
इस साल जनवरी में भी हरियाणा की बीजेपी सरकार ने उसे 30 दिन की पैरोल दी थी — वो भी दिल्ली विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, जिससे राजनीतिक मकसद को लेकर सवाल उठे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने नहीं सुनी SGPC की याचिका
फरवरी 2024 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने गुरमीत राम रहीम की लगातार रिहाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
लेकिन जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि यह सिर्फ एक व्यक्ति — यानी राम रहीम — के खिलाफ दायर की गई है, और इस आधार पर PIL को उचित नहीं माना गया।
कौन है राम रहीम और किन मामलों में दोषी है?
गुरमीत राम रहीम को 2017 में दो साध्वियों के बलात्कार के मामले में दोषी करार दिया गया था। इसके बाद पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या और डेरा प्रबंधक रणजीत सिंह की हत्या के मामलों में भी उसे सजा सुनाई गई।
फिर भी उसे बार-बार रिहा किया जाना, न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
सामाजिक संगठनों और सिख संगठनों का विरोध
SGPC समेत कई सिख और मानवाधिकार संगठनों ने राम रहीम की लगातार हो रही रिहाई को लेकर नाराज़गी जताई है। उनका आरोप है कि सरकार राजनीतिक फायदे के लिए एक बलात्कारी और हत्यारे को बार-बार बाहर आने दे रही है, जिससे समाज में गलत संदेश जा रहा है।
गुरमीत राम रहीम को एक बार फिर जेल से बाहर आने की छूट मिलना केवल कानूनी बहस नहीं, बल्कि राजनीतिक और नैतिक प्रश्न भी खड़ा करता है।
सरकार की इस निर्णय पर जनता और संगठनों की निगाहें टिकी हुई हैं — क्या एक सजायाफ्ता अपराधी को बार-बार पैरोल देना कानून और लोकतंत्र की भावना के खिलाफ नहीं है?