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नेहरू पर थरूर का संतुलित बयान, भाजपा को दिया साफ संदेश

नेहरू पर थरूर का संतुलित बयान, भाजपा को दिया साफ संदेश

Last Updated Jan - 09 - 2026, 10:56 AM | Source : Fela News

केरल पुस्तक महोत्सव में शशि थरूर ने नेहरू की गलतियां स्वीकारने की बात कही, लेकिन हर समस्या का दोष नेहरू पर मढ़ने को अनुचित बताया।
नेहरू पर थरूर का संतुलित बयान
नेहरू पर थरूर का संतुलित बयान

कांग्रेस सांसद Shashi Tharoor ने भारत के पहले प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru को लेकर एक संतुलित और विचारोत्तेजक बयान दिया है। केरल विधानसभा अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव के मंच से बोलते हुए थरूर ने कहा कि नेहरू भारतीय लोकतंत्र के संस्थापकों में से एक थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनकी आलोचना नहीं की जा सकती। उन्होंने साफ किया कि वे नेहरू के "अंधभक्त" नहीं हैं और उनकी ऐतिहासिक गलतियों को स्वीकार करना जरूरी है।

केरल में आयोजित Kerala Legislative Assembly International Book Festival के दौरान थरूर ने कहा कि 1962 का भारत-चीन युद्ध नेहरू के नेतृत्व की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक था। इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता और न ही इससे मुंह मोड़ा जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि हर समकालीन समस्या के लिए नेहरू को जिम्मेदार ठहराना न तो ऐतिहासिक रूप से सही है और न ही बौद्धिक रूप से ईमानदार।

थरूर ने भाजपा पर परोक्ष रूप से कटाक्ष करते हुए कहा कि नेहरू की आलोचना और आत्ममंथन एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन आलोचना का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ। उन्होंने कहा कि नेहरू को भारत की हर चुनौती की जड़ बताना एक आसान राजनीतिक नैरेटिव हो सकता है, लेकिन इससे देश की जटिल समस्याओं का समाधान नहीं निकलता।

अपने संबोधन में थरूर ने यह भी स्पष्ट किया कि मौजूदा सरकार को "लोकतंत्र विरोधी” कह देना भी एक सरलीकरण होगा। उनके अनुसार, लोकतंत्र में असहमति, बहस और आलोचना की जगह होनी चाहिएचाहे वह अतीत के नेताओं की हो या वर्तमान सरकार की नीतियों की। थरूर ने जोर देकर कहा कि भारत की लोकतांत्रिक परंपरा इतनी मजबूत है कि वह विभिन्न विचारों को समाहित कर सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि थरूर का यह बयान कांग्रेस के भीतर एक परिपक्व और यथार्थवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है। जहां एक ओर वे नेहरू की विरासत का सम्मान करते हैं, वहीं दूसरी ओर ऐतिहासिक गलतियों को स्वीकारने से नहीं हिचकते। यह रुख उन्हें उन नेताओं से अलग करता है जो या तो पूर्ण महिमामंडन करते हैं या पूर्ण खंडन ।

शशि थरूर का यह बयान भारतीय राजनीति में एक संतुलित विमर्श की जरूरत को रेखांकित करता हैजहां इतिहास को न तो पूजा जाए और न ही राजनीति का हथियार बनाया जाए, बल्कि उससे सीख लेकर आगे बढ़ा जाए।

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