Last Updated Jul - 01 - 2025, 04:07 PM | Source : Fela News
राजस्थान के डीग ज़िले के बहज गांव में खुदाई के दौरान प्राचीन सरस्वती नदी से जुड़ा सुरंगनुमा जलमार्ग मिला है। यह खोज भारतीय इतिहास के नए संकेत दे सकती है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने राजस्थान के डीग ज़िले स्थित बहज गांव में एक ऐसा पुरातात्विक चमत्कार उजागर किया है, जो भारतीय इतिहास और संस्कृति की जड़ों को फिर से परिभाषित कर सकता है। अप्रैल 2024 से मई 2025 तक चली खुदाई में 23 मीटर गहराई में एक पैलेओचैनल (प्राचीन जलमार्ग) का पता चला है, जिसे ऋग्वेद में वर्णित पौराणिक सरस्वती नदी से जोड़कर देखा जा रहा है।
ASI जयपुर सर्कल के अधीक्षण पुरातत्वविद विनय गुप्ता ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में इस खोज की जानकारी साझा करते हुए इसे “भारतीय पुरातत्व में अभूतपूर्व खोज” बताया। उन्होंने कहा, “यह प्राचीन जल प्रणाली न केवल शुरुआती मानव बसावटों का आधार रही है, बल्कि बहज को सरस्वती सभ्यता की व्यापक सांस्कृतिक विरासत से भी जोड़ती है।”
3500–1000 ईसा पूर्व की बस्तियों के प्रमाण
बहज, जो मथुरा से लगभग 50 किलोमीटर दूर है, वहां खुदाई में मिली संरचनाएं और वस्तुएं 3500–1000 ईसा पूर्व की सभ्यताओं से जुड़ी हुई हैं। यहां मिट्टी के खंभों से बनी आवासीय संरचनाएं, स्तरीकृत खाइयां, भट्ठियां, लौह व तांबे के औज़ार मिले हैं। माइक्रोलिथिक उपकरणों के आधार पर इसे पूर्व-होलोसीन काल से भी जोड़ा जा रहा है।
धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरें
खुदाई में मिले 15 यज्ञ कुंड, शक्ति उपासना हेतु बनाए गए जलाशय, और शिव–पार्वती की टेराकोटा मूर्तियां (1000 ईसा पूर्व) बहज में धार्मिक जीवन के प्रमाण हैं। चार अधपकी सीलें भी मिलीं, जिनमें से दो पर ब्राह्मी लिपि अंकित है—इन्हें भारत में ब्राह्मी लिपि के सबसे प्राचीन दिनांकित प्रमाणों में माना जा रहा है।
महाजनपद काल के यज्ञ कुंडों से छोटे घड़े और बिना अंकित तांबे के सिक्के भी मिले हैं, जो भारतीय मुद्रा इतिहास की धारणा को बदल सकते हैं।
हस्तशिल्प और सामाजिक जीवन के प्रमाण
खुदाई में मिले अस्थि-निर्मित उपकरण, अर्ध-कीमती पत्थरों की माला, और शंख की चूड़ियां बहज के समृद्ध शिल्प परंपरा को दर्शाते हैं। वहीं, धातुकर्म और भट्ठियों से यहां के तकनीकी ज्ञान की भी झलक मिलती है।
सरकार की योजना और महत्व
संस्कृति मंत्रालय इस खोज को संरक्षित करने की योजना बना रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह खोज भारत के प्राचीन इतिहास, लिपि, मुद्रा, और नदी सभ्यता के नए अध्याय को खोल सकती है।
यह खुदाई न केवल बहज को ऐतिहासिक मानचित्र पर लाती है, बल्कि सरस्वती सभ्यता के अस्तित्व को ठोस पुरातात्विक प्रमाणों के साथ जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
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