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बीजेपी ने कार्यकारी अध्यक्ष वाला रास्ता क्यों चुना

बीजेपी ने कार्यकारी अध्यक्ष वाला रास्ता क्यों चुना

Last Updated Dec - 15 - 2025, 03:59 PM | Source : Fela News

राष्ट्रीय अध्यक्ष चयन से पहले बीजेपी ने रणनीति के तहत कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया
बीजेपी ने कार्यकारी अध्यक्ष वाला रास्ता क्यों चुना
बीजेपी ने कार्यकारी अध्यक्ष वाला रास्ता क्यों चुना

 

बीजेपी के संगठन में हाल ही में हुआ फैसला सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। पार्टी ने पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष की जगह राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर संकेत दे दिया है कि नेतृत्व से जुड़ी रणनीति अभी पूरी तरह तय नहीं हुई है।

बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद काफी समय से खाली होने की स्थिति में है, क्योंकि जेपी नड्डा का कार्यकाल पूरा हो चुका है और नया अध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया अभी अंतिम चरण में नहीं पहुंची है। इसी बीच पार्टी ने संगठनात्मक कामकाज को प्रभावित होने से बचाने के लिए राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष का पद सक्रिय किया है। यह कदम अस्थायी व्यवस्था के तौर पर देखा जा रहा है, ताकि पार्टी के रोजमर्रा के फैसले और चुनावी तैयारियां बिना रुकावट चलती रहें।

कार्यकारी अध्यक्ष को संगठन के संचालन, राज्यों के साथ समन्वय और चुनावी रणनीति से जुड़े कई अहम काम सौंपे जाते हैं। हालांकि उनके पास पूर्ण राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसी निर्णायक शक्तियां नहीं होतीं, लेकिन वे शीर्ष नेतृत्व और संगठन के बीच सेतु की भूमिका निभाते हैं। इससे पार्टी को यह फायदा मिलता है कि नेतृत्व परिवर्तन के दौर में भी नियंत्रण केंद्र के पास ही रहता है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। बीजेपी इस जरिए यह संदेश देना चाहती है कि संगठन पूरी तरह सक्रिय है और नेतृत्व को लेकर किसी तरह की अस्थिरता नहीं है। साथ ही पार्टी को नए अध्यक्ष के चयन के लिए अतिरिक्त समय भी मिल जाता है, ताकि जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक संतुलन को ध्यान में रखकर फैसला लिया जा सके।

इसके अलावा कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति से युवा और संगठनात्मक अनुभव वाले नेताओं को आगे लाने का रास्ता भी खुलता है। इससे पार्टी के भीतर नेतृत्व की नई कतार तैयार करने में मदद मिलती है, जो लंबे समय में बीजेपी की संगठनात्मक मजबूती का हिस्सा बन सकती है।

कुल मिलाकर, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष का चुनाव बीजेपी की मजबूरी नहीं बल्कि सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है। यह फैसला बताता है कि पार्टी नेतृत्व बदलाव को जल्दबाजी में नहीं, बल्कि संतुलन और नियंत्रण के साथ आगे बढ़ाना चाहती है।

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