Last Updated Nov - 08 - 2025, 04:08 PM | Source : Fela News
जेएनयू में लेफ्ट संगठनों का दबदबा बरकरार है। बार-बार हारने के बावजूद विपक्षी दल उनकी पकड़ नहीं तोड़ पा रहे। आखिर क्या है लेफ्ट की यह मजबूत जड़ें?
दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी JNU सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि राजनीति की दिशा तय करने वाले चेहरों के लिए भी जाना जाता है। हर साल यहां छात्र चुनाव होते हैं, और हर बार एक सवाल गूंजता है , आखिर JNU में लेफ्ट की पकड़ इतनी मजबूत क्यों है, जो तमाम लहरों के बावजूद ढीली नहीं पड़ती।
ओएन शुक्ला से लेकर अदिति मिश्रा तक, कई चेहरे बदले, मुद्दे बदले, माहौल बदला, लेकिन लेफ्ट का किला जस का तस खड़ा है। इसके पीछे सिर्फ विचारधारा नहीं, बल्कि वर्षों से बनी एक संगठित छात्र संस्कृति है, जो कैंपस की राजनीति को गहराई से समझती और दिशा देती है। लेफ्ट संगठनों ने न सिर्फ छात्र मुद्दों पर लगातार आवाज उठाई है, बल्कि प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ भी मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाई है।
JNU की दीवारों पर लिखे नारे, कैंपस के अंदर चलती विचार-बहसें और रात तक जारी जनसभाएं — ये सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं, जहां विचार की स्वतंत्रता और प्रतिरोध की भावना एक परंपरा बन गई है। लेफ्ट की ताकत इसी परंपरा से आती है, जिसने नई पीढ़ी को भी अपनी ओर खींचे रखा है।
दूसरी ओर, नेशनलिस्ट और सेंटर-राइट संगठनों ने कई बार इस किले को हिलाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें अभी तक स्थायी सफलता नहीं मिली। वजह है — लेफ्ट का जमीनी जुड़ाव, मजबूत संगठन और लगातार कैंपस स्तर पर सक्रिय रहना। जहां दूसरे दल चुनाव के मौसम में दिखाई देते हैं, वहीं लेफ्ट के कार्यकर्ता सालभर हर मुद्दे पर मौजूद रहते हैं।
JNU की राजनीति सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि सोच की टक्कर भी है। और जब तक यह बहस ज़िंदा है, लेफ्ट की पकड़ टूटना शायद आसान नहीं। यह किला विचारों का है, और विचारों को गिराने के लिए सिर्फ नारे नहीं, बल्कि निरंतर संवाद और विश्वास चाहिए।
शायद यही वजह है कि JNU में लेफ्ट सिर्फ जीतती नहीं, बल्कि एक परंपरा को भी जिंदा रखती है ,सवाल पूछने की, विरोध करने की और सोचने की आज़ादी की।
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