Last Updated Dec - 19 - 2025, 04:06 PM | Source : Fela News
दिल्ली की जहरीली स्मॉग पर चीन ने प्रदूषण नियंत्रण अनुभव साझा करने की पेशकश की, नियमों और तकनीक पर जोर
भारत की राजधानी दिल्ली और कई बड़े शहर इन दिनों जहरीली स्मॉग और खराब वायु गुणवत्ता से जूझ रहे हैं। प्रदूषण का यह समस्या हर सर्दी में गंभीर रूप ले लेती है और लोगों की सेहत, स्कूल-काम और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करती है। इसी संकट के बीच चीन ने अपने अनुभव साझा करने का प्रस्ताव रखा है।
चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने कहा है कि हवा-प्रदूषण जैसे मुद्दे भारत और चीन दोनों के लिए चुनौती रहे हैं। बीजिंग ने भी पहले घनी आबादी और तेज़ी से बढ़ते शहरों में स्मॉग जैसी समस्याएँ झेली हैं। अब चीन भारत के साथ अपना प्रदूषण नियंत्रण अनुभव साझा करने को तैयार है। हालांकि उन्होंने साफ़ किया कि “बीजिंग मॉडल को कहीं और लागू करने” जैसा कोई ज़िद्द नहीं है। हर देश-हर शहर की अपनी परिस्थितियाँ होती हैं और समाधान भी अलग होंगे।
बीजिंग ने पिछले दशक में प्रदूषण को कम करने के लिए कई कठोर उपाय अपनाए थे। उन्होंने वाहनों के उत्सर्जन मानकों को भारी रूप से सख़्त किया, पुराने प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को हटाया और सार्वजनिक परिवहन तथा इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया। साथ ही भारी उद्योगों को शहर से बाहर स्थानांतरित किया गया और आस-पास के इलाकों के साथ समन्वय बढ़ाया गया, ताकि प्रदूषण को जड़ से रोका जा सके।
चीनी दूतावास ने यह भी बताया कि बीजिंग ने ‘China 6’ जैसा उन्नत वाहन उत्सर्जन मानक अपनाया और पुराने, उच्च-प्रदूषण वाले वाहनों को धीरे-धीरे हटाया। इसके साथ-साथ लाइसेंस-प्लेट लॉटरी और ऑड-ईवन जैसे नियम लागू किये गए जिससे निजी गाड़ियों की संख्या और धुआँ कम हुआ। पब्लिक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क को भी मजबूत बनाने पर ज़ोर दिया गया ताकि लोग निजी वाहन की बजाय बस और मेट्रो का उपयोग करें।
भारत में भी सरकार कई कदम ले रही है, जैसे पुराने वाहनों और प्रदूषण सर्टिफिकेट न होने पर ईंधन न देना, निर्माण कार्यों पर रोक, और Stage-4 प्रदूषण नियंत्रण योजनाएँ लागू करना। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ़ शुरुआत है और दीर्घकालिक, व्यापक उपायों की ज़रूरत है। चीन ने भी यह स्वीकार किया है कि कोई एक-सार ग़्लोबल फॉर्मूला नहीं है और देश को अपनी परिस्थितियों के हिसाब से रणनीति बनानी होगी।
चीन का प्रस्ताव, अनुभव साझा करने का यह कदम, दोनों देशों के लिए एक सीख हो सकता है कि कैसे सख़्त नियम, तकनीकी निवेश और क्षेत्रीय सहयोग से बड़ी प्रदूषण समस्या को कुछ हद तक काबू में लाया जा सकता है। लेकिन हर देश को अपनी ज़मीन-हकीकत के आधार पर अपने समाधान ढूँढने होंगे।