Last Updated Feb - 02 - 2026, 04:48 PM | Source : Fela News
इंसान ने धरती के भीतर अब तक 12,262 मीटर तक खुदाई की है। भीषण तापमान, दबाव और चट्टानों के व्यवहार ने आगे बढ़ने की वैज्ञानिक सीमा तय कर दी।
इंसान ने ऊंचे पहाड़ फतह किए, महासागरों की गहराई नापी, अंतरिक्ष तक पहुंच बनाई, लेकिन जब बात धरती के भीतर गहराई तक खुदाई करने की आती है, तो हमारी सीमाएं साफ दिखाई देने लगती हैं। आधुनिक तकनीक के बावजूद हम पृथ्वी की सतह को मुश्किल से ही छू पाए हैं। धरती के भीतर जाने की इस कोशिश का सबसे बड़ा उदाहरण है रूस में किया गया 'कोला सुपरडीप बोरहोल' प्रयोग, जिसने दुनिया को यह समझाया कि पृथ्वी के अंदर जाना जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं।
कोला सुपरडीप बोरहोल सोवियत संघ द्वारा 1970 के दशक में शुरू किया गया एक वैज्ञानिक प्रोजेक्ट था। इसका उद्देश्य था पृथ्वी की पपड़ी (Crust) के भीतर की संरचना को समझना । कई सालों की लगातार मेहनत के बाद वैज्ञानिक 12,262 मीटर यानी करीब 12.2 किलोमीटर की गहराई तक पहुंचने में सफल हुए। यह आज तक इंसानों द्वारा खोदा गया सबसे गहरा गड्ढा माना जाता है। तुलना करें तो यह गहराई माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई से भी अधिक है।
लेकिन यह उपलब्धि सुनने में जितनी बड़ी लगती है, धरती के आकार के सामने उतनी ही छोटी है। पृथ्वी की पपड़ी की मोटाई अलग-अलग जगहों पर 35 से 70 किलोमीटर तक होती है। यानी कोला प्रोजेक्ट के बावजूद इंसान धरती की बाहरी परत के एक तिहाई हिस्से तक भी नहीं पहुंच पाया।
इस खुदाई को रोकने की सबसे बड़ी वजह बनी अत्यधिक गर्मी और दबाव। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था कि इतनी गहराई पर तापमान करीब 100 डिग्री सेल्सियस होगा, लेकिन असल में यह 180 डिग्री तक पहुंच गया। यह तापमान ड्रिलिंग मशीनों और उपकरणों के लिए बेहद खतरनाक था। मशीनों के हिस्से पिघलने लगे और आगे खुदाई करना असंभव हो गया।
सिर्फ तापमान ही नहीं, बल्कि चट्टानों का व्यवहार भी एक बड़ी समस्या बन गया । इतनी गहराई पर भारी दबाव के कारण ठोस चट्टानें प्लास्टिक जैसी नरम होकर बहने लगती हैं। जब ड्रिलिंग रुकती, तो बोरहोल की दीवारें धीरे-धीरे भरने लगतीं। इस स्थिति में गड्ढे को स्थिर रखना बेहद मुश्किल हो जाता है।
हालांकि तकनीकी चुनौतियों के बावजूद इस प्रोजेक्ट से कई चौंकाने वाली वैज्ञानिक खोजें भी हुईं। लगभग 6-7 किलोमीटर नीचे वैज्ञानिकों को दो अरब साल पुराने सूक्ष्म जीवाश्म मिले। चट्टानों के भीतर मिनरल से भरा गर्म पानी मिला, बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन गैस निकली और करीब 9 किलोमीटर की गहराई पर सोने के संकेत भी मिले।
यह प्रयोग हमें बताता है कि पृथ्वी का मेंटल, जो पपड़ी के नीचे स्थित है, अभी भी इंसानों की पहुंच से बहुत दूर है। मौजूदा तकनीक इतनी गर्मी, दबाव और चट्टानों के बदलते स्वरूप को सहन करने में सक्षम नहीं है।
इसलिए सवाल 'धरती में कितना गहरा गड्ढा खोदा जा सकता है' का जवाब फिलहाल यही है कि लगभग 12 किलोमीटर के बाद विज्ञान की सीमाएं सामने आ जाती हैं। पृथ्वी के भीतर की दुनिया आज भी इंसानों के लिए एक रहस्य बनी हुई है।
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