Last Updated Jan - 10 - 2026, 03:32 PM | Source : Fela News
ईरान में उग्र प्रदर्शनों के बीच क्राउन प्रिंस रजा पहलवी की वापसी की चर्चा तेज । 50 साल बाद सत्ता और सियासत में लौटना आसान नहीं ।
ईरान इन दिनों गंभीर राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। बढ़ती महंगाई, गिरती मुद्रा और बेरोज़गारी के खिलाफ बीते दो हफ्तों से जारी विरोध प्रदर्शन अब उग्र रूप ले चुके हैं। कई शहरों में हालात बेकाबू बताए जा रहे हैं और अब तक 60 से ज्यादा लोगों की मौत की खबरें सामने आ चुकी हैं। इसी बीच एक नाम बार-बार इन प्रदर्शनों के दौरान गूंज रहा है —ईरान के कथित क्राउन प्रिंस Reza Pahlavil
प्रदर्शनकारियों के एक वर्ग ने सड़कों पर “रजा वापस आओ” जैसे नारे लगाए हैं, जिससे यह सवाल फिर चर्चा में आ गया है कि क्या रजा पहलवी लगभग 50 साल बाद अपने वतन लौट सकते हैं। रजा पहलवी के पिता मोहम्मद रजा शाह पहलवी को 1979 की इस्लामिक क्रांति के दौरान सत्ता छोड़नी पड़ी थी। उस समय लाखों लोग सड़कों पर उतरे थे और राजशाही का अंत हो गया था। इसके बाद से पहलवी परिवार देश से बाहर ही रह रहा है।
रजा पहलवी बीते कई दशकों से निर्वासन में हैं और खुद को लोकतंत्र समर्थक नेता के रूप में पेश करते रहे हैं। वे कई बार कह चुके हैं कि उनका लक्ष्य सत्ता हथियाना नहीं, बल्कि ईरान में यह तय करने का अधिकार जनता को दिलाना है कि वे किस तरह की शासन व्यवस्था चाहते हैं। मौजूदा प्रदर्शनों के बीच उनका नाम उभरना यह दिखाता है कि ईरानी समाज का एक हिस्सा मौजूदा व्यवस्था से गहरी नाराजगी महसूस कर रहा है।
हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि रजा पहलवी की वापसी आसान नहीं होगी। सबसे बड़ी चुनौती ईरान की मौजूदा राजनीतिक और धार्मिक संरचना है, जहां सत्ता पर कड़ा नियंत्रण है। सुरक्षा बल, रिवोल्यूशनरी गार्ड और धार्मिक नेतृत्व किसी भी बाहरी या राजशाही से जुड़ी वापसी को सीधी चुनौती मान सकते हैं। इसके अलावा, ईरान की युवा पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग राजशाही के दौर को सिर्फ इतिहास की किताबों में जानता है, भावनात्मक जुड़ाव सीमित हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति जटिल है। ईरान पहले ही पश्चिमी देशों के साथ तनावपूर्ण रिश्तों से जूझ रहा है। ऐसे में रजा पहलवी की संभावित वापसी को विदेशी समर्थन से जोड़कर देखा जा सकता है, जो उनके लिए मुश्किलें और बढ़ा सकती है।
फिलहाल, यह साफ है कि रजा पहलवी की वापसी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि ईरान के भविष्य की दिशा से जुड़ा सवाल बन चुकी है। क्या यह नाम सिर्फ नारों तक सीमित रहेगा या सचमुच इतिहास एक नया मोड़ लेगा इसका जवाब आने वाले वक्त में ही मिलेगा।