Last Updated Feb - 11 - 2026, 12:17 PM | Source : Fela News
भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर व्हाइट हाउस ने फैक्ट शीट में अहम बदलाव किए हैं. दाल का जिक्र हटाया गया और 500 अरब डॉलर खरीद प्रतिबद्धता को 'इरादा' में बदला गया.
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर एक नया मोड़ सामने आया है. व्हाइट हाउस ने अपनी आधिकारिक फैक्ट शीट में बदलाव करते हुए उन बिंदुओं को संशोधित कर दिया है, जिन पर पिछले कुछ दिनों से भारत की सियासत गरमाई हुई थी. खास तौर पर दालों (पल्सेज़) का जिक्र हटाए जाने और 500 अरब डॉलर की प्रस्तावित खरीद को लेकर इस्तेमाल की गई भाषा में बदलाव ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है.
मंगलवार को जारी फैक्ट शीट में पहले उल्लेख था कि भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों, जिनमें कुछ दालें भी शामिल हैं, पर शुल्क कम या समाप्त करेगा. साथ ही यह भी कहा गया था कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर से अधिक के उत्पाद खरीदने के लिए "प्रतिबद्ध" है. लेकिन ताजा संशोधन में दालों का संदर्भ हटा दिया गया है और "कमिटमेंट" शब्द की जगह "इंटेंड" यानी "इरादा रखता है" लिखा गया है. यह शब्दों का बदलाव भले ही तकनीकी लगे, लेकिन कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर इसके मायने बड़े हैं.
दरअसल, विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया था. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने आरोप लगाया था कि दालों को चुपचाप फैक्ट शीट में जोड़ा गया, जबकि यह 6 फरवरी 2026 को जारी भारत-अमेरिका संयुक्त वक्तव्य का हिस्सा नहीं था. उनका कहना था कि सरकार ने देशवासियों, खासकर किसानों से यह जानकारी छिपाई. विपक्ष का तर्क था कि अगर भारत अमेरिकी दालों और अन्य कृषि उत्पादों पर शुल्क में रियायत देता है, तो इससे घरेलू किसानों पर असर पड़ सकता है.
सरकार ने हालांकि इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि किसी भी संवेदनशील कृषि क्षेत्र के हितों से समझौता नहीं किया गया है. उनका कहना है कि भारत के किसानों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी समझौते में ऐसे उत्पाद शामिल नहीं किए गए हैं, जिनसे देश के कृषि क्षेत्र को नुकसान हो. कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कहा कि सोयाबीन, मक्का, गेहूं, चावल, चीनी, दालें और डेयरी उत्पाद जैसे अहम सेक्टर पर कोई टैरिफ रियायत नहीं दी गई है.
व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट में यह भी उल्लेख है कि भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अमेरिका पर सबसे अधिक शुल्क बनाए रखने वाले देशों में से एक है. कृषि उत्पादों पर औसतन 37 प्रतिशत और कुछ वाहनों पर 100 प्रतिशत से अधिक शुल्क का हवाला दिया गया है. साथ ही गैर-शुल्क बाधाओं को भी व्यापार में रुकावट बताया गया है. दस्तावेज में यह संकेत दिया गया है कि दोनों देश आने वाले हफ्तों में एक अंतरिम समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में काम करेंगे.
अब सवाल यह है कि दाल का जिक्र हटाना केवल शब्दों का संशोधन है या फिर रणनीतिक संदेश ? विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम घरेलू राजनीतिक दबाव और कूटनीतिक संतुलन दोनों का परिणाम हो सकता है. फिलहाल इतना तय है कि इस बदलाव ने ट्रेड डील को लेकर बहस को और तेज कर दिया है, और आने वाले दिनों में इस पर और स्पष्टता सामने आ सकती है.
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