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अमेरिका यूरोप व्यापार समझौतों को लेकर अर्थशास्त्री पनगढ़िया का बड़ा बयान

अमेरिका यूरोप व्यापार समझौतों को लेकर अर्थशास्त्री पनगढ़िया का बड़ा बयान

Last Updated Feb - 06 - 2026, 04:14 PM | Source : Fela News

अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने भारत के हालिया व्यापार समझौतों को अहम आर्थिक कदम बताया है। उन्होंने इन्हें 1991 के आर्थिक सुधारों से भी अधिक प्रभावशाली करार दिय
अमेरिका यूरोप व्यापार समझौतों को लेकर अर्थशास्त्री पनगढ़िया का बड़ा बयान
अमेरिका यूरोप व्यापार समझौतों को लेकर अर्थशास्त्री पनगढ़िया का बड़ा बयान

भारत के अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ प्रस्तावित एवं प्रगति पर चल रहे व्यापार समझौतों को लेकर अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया का बयान चर्चा में है। उन्होंने कहा है कि यदि ये समझौते पूरी तरह लागू होते हैं तो इनका प्रभाव 1991 के आर्थिक उदारीकरण सुधारों से भी बड़ा साबित हो सकता है। पनगढ़िया का मानना है कि वैश्विक बाजारों तक व्यापक पहुंच भारत की अर्थव्यवस्था को नई गति दे सकती है।

सूत्रों के अनुसार उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि 1991 के सुधारों ने भारत की अर्थव्यवस्था को खोलने का काम किया था, जबकि मौजूदा व्यापार समझौते भारत को विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ गहरे आर्थिक एकीकरण की दिशा में ले जा सकते हैं। उनका कहना है कि टैरिफ में कमी, निर्यात अवसरों का विस्तार और निवेश प्रवाह में वृद्धि जैसे कारक दीर्घकालिक प्रभाव डालेंगे।

बताया जा रहा है कि भारत, अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार, तकनीक, सप्लाई चेन और निवेश सहयोग को लेकर कई दौर की वार्ताएं चल रही हैं। इन समझौतों का फोकस मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल ट्रेड, ग्रीन टेक्नोलॉजी और सेवा क्षेत्र पर भी है। पनगढ़िया ने कहा कि यदि भारतीय उद्योग प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ाने में सफल रहता है तो रोजगार और उत्पादन दोनों में वृद्धि संभव है।

वहीं दूसरी ओर कुछ व्यापार विशेषज्ञों ने सावधानी बरतने की जरूरत भी जताई है। सवाल उठाए जा रहे हैं कि घरेलू उद्योगों पर प्रतिस्पर्धी दबाव बढ़ सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां लागत संरचना अभी वैश्विक स्तर से मेल नहीं खाती। इस पर पनगढ़िया का कहना है कि सुधारों के साथ नीतिगत समर्थन और संरचनात्मक बदलाव जरूरी होंगे।

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार सरकार चरणबद्ध तरीके से व्यापार वार्ताओं को आगे बढ़ा रही है, ताकि संवेदनशील क्षेत्रों के हित सुरक्षित रखे जा सकें। निर्यात प्रोत्साहन, उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन योजनाएं और लॉजिस्टिक सुधारों को भी समानांतर रूप से जोड़ा जा रहा है।

बताया जा रहा है कि इन संभावित समझौतों को भारत की वैश्विक आर्थिक भूमिका मजबूत करने के दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। हालांकि अंतिम प्रभाव उनके क्रियान्वयन, शर्तों और घरेलू नीति तालमेल पर निर्भर करेगा।

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