Last Updated Aug - 22 - 2025, 03:35 PM | Source : Fela News
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाह एक सामाजिक संस्था है, जहां दोनों पक्षों की जिम्मेदारियां और समझौते जरूरी हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह में पूर्ण स्वतंत्रता स
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि चल रहे विवाह में पति-पत्नी का पूरी तरह स्वतंत्र रहना "असंभव" है। अदालत ने कहा कि विवाह का अर्थ ही दो आत्माओं का साथ है और इसमें भावनात्मक रूप से एक-दूसरे पर निर्भरता जरूरी है। यह टिप्पणी 21 अगस्त 2025 को एक दंपति के matrimonial dispute की सुनवाई के दौरान की गई।
जस्टिस बीवी नागरथ्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा, “कोई पति या पत्नी यह नहीं कह सकता कि विवाह जारी रहते हुए मैं स्वतंत्र रहना चाहता हूं। विवाह का मतलब साथ आना है। फिर स्वतंत्र कैसे हो सकते हैं?” सुनवाई में पत्नी, जो हैदराबाद से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुईं, ने स्वतंत्र रहने की इच्छा जताई, जबकि सिंगापुर में कार्यरत पति, जो इस समय भारत में मौजूद हैं, ने बच्चों की कस्टडी और विजिटेशन राइट्स मांगे।
जस्टिस नागरथ्ना ने कहा, “आप कहें कि मुझे किसी पर निर्भर नहीं होना है, तो फिर शादी ही क्यों की? हो सकता है मैं पुरानी सोच की हूं, लेकिन कोई पत्नी यह नहीं कह सकती कि मैं पति पर निर्भर नहीं रहना चाहती।” अदालत ने दोनों को बच्चों के हित में सुलह करने की सलाह दी और कहा कि छोटे बच्चों को टूटा हुआ घर नहीं देखना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी और बच्चों के लिए 5 लाख रुपये अंतरिम भरण-पोषण के रूप में जमा करें। साथ ही पति को अपने छोटे बेटे का जन्मदिन 23 अगस्त 2025 को मनाने के लिए बच्चों की अंतरिम कस्टडी भी दी गई।