Last Updated Feb - 20 - 2026, 10:58 AM | Source : Fela News
महाराष्ट्र के भिवंडी नगर निगम में मेयर चुनाव ने सियासत को चौंका दिया। कांग्रेस ने BJP उम्मीदवार को समर्थन दिया, जिससे शिंदे गुट की रणनीति को बड़ा राजनीतिक झटका लगा।
महाराष्ट्र की राजनीति में भिवंडी महानगरपालिका का मेयर चुनाव एक अप्रत्याशित मोड़ लेकर आया है। यहां परंपरागत रूप से एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने मेयर पद के लिए एकजुट होकर नया राजनीतिक समीकरण बना दिया।
कांग्रेस ने BJP की उम्मीदवार स्नेहा पाटील को आधिकारिक समर्थन देने का फैसला किया, जिससे राज्य की स्थानीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस घटनाक्रम को मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
भिवंडी-निजामपुर महानगरपालिका चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। 90 सीटों वाली इस नगर निगम में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसे 30 सीटें मिलीं। वहीं BJP ने 22 सीटें जीतकर दूसरा स्थान हासिल किया।
एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को 12 सीटें मिलीं, जबकि शरद पवार गुट की NCP-SP ने भी 12 सीटों पर जीत दर्ज की। समाजवादी पार्टी को 6 सीटें मिलीं, जबकि अन्य छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी कुछ सीटें जीतीं ।
ऐसे में मेयर पद के लिए समर्थन जुटाना सभी दलों के लिए चुनौती बन गया था। इसी बीच कांग्रेस ने BJP उम्मीदवार स्नेहा पाटील को समर्थन देने का फैसला किया। कांग्रेस ने इस समर्थन को औपचारिक रूप से पत्र जारी कर स्पष्ट भी कर दिया। इससे BJP की स्थिति मजबूत हो गई और मेयर पद के लिए उसकी राह आसान होती दिखाई देने लगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह गठजोड़ स्थानीय सत्ता समीकरणों का परिणाम है, जहां दल अपने राजनीतिक हितों और रणनीतिक लाभ के आधार पर फैसले लेते हैं। हालांकि, इस फैसले ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। शिंदे गुट महाराष्ट्र में BJP का सहयोगी है, लेकिन भिवंडी में BJP का कांग्रेस के साथ जाना स्थानीय स्तर पर अलग राजनीतिक संकेत देता है।
इस घटनाक्रम के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह गठजोड़ केवल स्थानीय रणनीति है या इसके पीछे बड़े राजनीतिक संकेत छिपे हैं। कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि स्थानीय निकाय चुनावों में अक्सर दल अपने सहयोगियों से अलग रणनीति अपनाते हैं, क्योंकि यहां सत्ता संतुलन और स्थानीय समीकरण अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
भिवंडी मेयर चुनाव का यह घटनाक्रम यह भी दर्शाता है कि महाराष्ट्र की राजनीति में समीकरण तेजी से बदल सकते हैं। विरोधी दल भी परिस्थितियों के अनुसार साथ आ सकते हैं, जबकि सहयोगी दल अलग राह चुन सकते हैं।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस नए राजनीतिक समीकरण का राज्य की व्यापक राजनीति पर क्या असर पड़ता है और क्या इससे अन्य स्थानीय निकायों में भी इसी तरह के गठजोड़ देखने को मिलेंगे।
यह भी पढ़े