Last Updated Feb - 25 - 2026, 05:59 PM | Source : Fela News
BJP सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने दिल्ली का नाम 'इंद्रप्रस्थ' रखने की मांग उठाई है। उनका दावा है कि यह नाम प्राचीन इतिहास से जुड़ा है और सांस्कृतिक पहचान मजबूत करेगा।
भारत की राजधानी दिल्ली का नाम विश्व भर में प्रसिद्ध है, लेकिन इतिहासकटरी और पुरातत्व विशेषजी कर मानना है कि प्राचीन काल में यही भौगोलिक क्षेत्र "इंद्रप्रस्थ" नाम से जाना जाता था। अब यह नाम सुर्खियों में एक बार फिर से आया है, क्योंकि BJP सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने दिल्ली का आधिकारिक नाम बदलकर इंटप्रस्थ रखने का प्रस्ताव रखा है।
इस प्रस्ताव में न सिर्फ इतिहास प्रेमियों की उत्सुकता बढ़ाई है, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक चर्चा भी तेज कर
खंडेलवाल का कहना है कि महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों में इंदप्रस्थ का उल्लेख एक प्रमुख नगर के रूप में मिलता है, जिसे पांडवों की राजधानी के रूप में भी दिखाया गया है। वे बताते हैं कि इस नाम को अपनाना न केवल राजधानी के प्राधीन गौरव को याद दिलाएगा, बल्कि भारतीय सभ्यता की गहरी सांस्कृतिक जहाँ को भी सम्मान देगा। उन्होंने कहा कि "जब हमारे पास प्राचीन परंपरा का इतिहास मौजूद है, तो क्यों न हम उसे पुनर्जीवित करें?"
इतिहास के पन्नों में इंद्रप्रस्थ का उल्लेख विस्तृत रूप से मिलता है। महादान के दौरान इंद्रप्रस्थ एक संपन्न, संरक्षित और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध नगर था, जहाँ पांडवों ने शासन किया। पुरातत्व अनुसंधानों के आधार पर भी यह माना जाता है कि दिल्ली-एनसीआर का भूभाग उस समय के कई सभ्यताओं का केंद्र रहा है। हालांकि, शोधकर्ताओं के बीच यह अब भी बहस का विषय है कि प्राधीन इंद्रप्रस्थ का सटीक स्थान वर्तमान दिल्ली से कितना मेल खाता है।
खंडेलवाल का प्रस्ताव केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार इंद्रप्रस्थ नाम अपनाने से देश की संस्कृति, कला, इतिहास और प्राचीन गौरव को नई पीढ़ी तक पहचाना जा सकेगा। वे यह भी मानते हैं कि यह कदम विदेशियों और शोधकर्ताओं के लिए आरत के इतिहास का आकर्षक विषय बनेगा और दिल्ली को एक नई पहचान देगा।
हालांकि, इतिहासकारों की प्रतिक्रिया लिखित है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि प्राचीन काल में इंडपस्थ का उल्लेख मिलता है, लेकिन यह सुनिश्चित करना मुश्किल है कि वह वर्तमान दिल्ली ही था या उसके आसपास का कोई औगोलिक आग। कई कई विद्वानों का तर्क है कि इतिहास में ऐसे नामों का उपयोग प्रतीकात्मक रूप से होता था और उन स्थानों की ठीक-ठीक पहचान करना आज की पुरातात्विक स्थितियों में चुनौतीपूर्ण है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो नाम बदलने का प्रस्व हमेशा से ही गहन चर्चाओं का विषय रहा है। नेताओं द्वारा ऐसे प्रस्ताव इसलिए भी उठाए जाते हैं ताकि समाज में औपनिवेशिक नामों से हटकर भारतीय सांस्कृतिक पहचान को पुनस्र्स्थापित किया जा सके। ऐसे बदलावों से कई बार समाज में राष्ट्रीय भावनाओं और गौरव की आवना मजबूत होती है, लेकिन यह प्रक्रिया आसान नहीं होती।
एक शहर का नाम बदलने के लिए केवल इतिहासक समर्थन ही काफी नहीं होता, इसके लिए कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक सहमति भी आवश्यक होती है। संसद में प्रस्ताव लाना, राज्य तथा केंद्र सरकारों की स्वीकृति, जनमत और सार्वजनिक बहस ये सभी प्रक्रिया के अहम हिस्से हैं। नाम बदलले से जुड़े कई दस्तावेजी, मानचित्री, पहचान रिकॉर्ड और और अंतरराष्ट्रीय मान्यताओं को भी संशोधित करना होता है, जो समय-साध्य और खचीला हो सकता है।
नाम परिवर्तन का मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगा। इससे जुड़े सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहलू भी सामने आएंगे। समर्थन में कह सकते हैं कि इससे भारतीय इतिहास को सम्मान मिलेगा, जबकि विरोध में यह तर्क हो सकता है कि इससे वर्तमान पहचान और प्रशासनिक स्थिरता पर प्रभाव पड़ेगा।
कल मिलाकर दिल्ली का नाम बदलकर इंद्रप्रस्थ रखने का प्रस्ताव केवल एक नाम परिवर्तन से बढ़कर है। यह इतिहास, पहयान, संस्कृति और सता की सोच का मिश्रण है। जैसे-जैसे यह पस्ताव आगे बढ़ेगा, समाज और राजनीति में इसकी चहस और प्रतिक्रिया दोनों और उन कर सामने आयेंगी।
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