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ऑपरेशन सिंदूर बरसी पर भारत को मिलेगी तीसरी परमाणु पनडुब्बी

ऑपरेशन सिंदूर बरसी पर भारत को मिलेगी तीसरी परमाणु पनडुब्बी

Last Updated Feb - 20 - 2026, 04:25 PM | Source : Fela News

भारतीय नौसेना जल्द तीसरी स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिदमन को शामिल कर सकती है। सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर की बरसी के आसपास कमीशनिंग संभावित, समुद्री ताकत बढ़ेगी।
ऑपरेशन सिंदूर बरसी पर भारत को मिलेगी तीसरी परमाणु पनडुब्बी
ऑपरेशन सिंदूर बरसी पर भारत को मिलेगी तीसरी परमाणु पनडुब्बी

भारतीय नौसेना इस वर्ष अप्रैल-मई के आसपास अपनी तीसरी स्वदेशी परमाणु ऊर्जा संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी आईएनएस अरिदमन को सेवा में शामिल करने की तैयारी कर रही है। बताया जा रहा है कि संभावित कमीशनिंग का समय ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की वर्षगांठ के आसपास पड़ सकता है। सूत्रों ने इस संबंध में जानकारी दी है।

नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने दिसंबर में पुष्टि की थी कि यह पनडुब्बी 2026 में कमीशन होने की संभावना है। फिलहाल यह समुद्री परीक्षणों के अंतिम चरण में है, जहां सिस्टम सत्यापन और हथियारों के एकीकरण की प्रक्रिया पूरी होने के करीब बताई जा रही है।

सूत्रों के मुताबिक शिप बिल्डिंग सेंटर में निर्मित यह पनडुब्बी भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। आईएनएस अरिदमन को ‘सेकंड स्ट्राइक’ क्षमता बढ़ाने के लिहाज से अहम माना जा रहा है, जो देश की रणनीतिक सुरक्षा नीति का प्रमुख हिस्सा है।

बताया जा रहा है कि एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल (ATV) कार्यक्रम के तहत विकसित आईएनएस अरिदमन (S4) अपने पूर्ववर्ती प्लेटफॉर्म की तुलना में अधिक सक्षम है। इसका डिस्प्लेसमेंट लगभग 7,000 टन बताया गया है, जो पहले शामिल आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात के करीब 6,000 टन विस्थापन से अधिक है। यह पनडुब्बी लंबी दूरी की K-4 बैलिस्टिक मिसाइलों को ले जाने के लिए डिजाइन की गई है, जिससे भारत की मारक क्षमता में बढ़ोतरी होगी।

वहीं दूसरी ओर नौसेना प्रमुख के बयानों के मुताबिक पनडुब्बी ने कई महत्वपूर्ण विकास चरण पूरे कर लिए हैं और शुरुआती गर्मियों में इसके शामिल होने की संभावना अधिक मानी जा रही है। प्रशासन का कहना है कि इसके शामिल होने से समुद्री सीमाओं पर भारत की रणनीतिक पहुंच और सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।

आईएनएस अरिदमन का नौसेना में शामिल होना भारत के न्यूनतम विश्वसनीय परमाणु निवारण सिद्धांत को और मजबूती देने वाला कदम माना जा रहा है। इसके साथ ही समुद्री क्षेत्र में भारत की सामरिक उपस्थिति भी और मजबूत होगी।

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