Last Updated Feb - 06 - 2026, 06:18 PM | Source : Fela News
वैश्विक दबाव और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच भारत की ऊर्जा रणनीति चर्चा में है। विशेषज्ञों का कहना है कि रूसी तेल आयात पूरी तरह रोकना व्यावहारिक रूप से जटिल
रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत की नीति एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक दबावों के बीच यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या भारत रूसी तेल आयात को चरणबद्ध तरीके से कम या बंद कर सकता है। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय उतना सरल नहीं है जितना राजनीतिक बयानबाजी में प्रतीत होता है।
सूत्रों के अनुसार भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। रूस से मिलने वाला तेल रियायती दरों पर उपलब्ध रहा है, जिससे आयात बिल और घरेलू ईंधन मूल्य प्रबंधन में सहायता मिली है। ऐसे में अचानक आयात बंद करने से लागत संरचना पर सीधा असर पड़ सकता है।
बताया जा रहा है कि रिफाइनरी कॉन्फिगरेशन भी एक महत्वपूर्ण कारक है। भारत की कई रिफाइनरियां विशेष ग्रेड के कच्चे तेल के अनुरूप तकनीकी रूप से अनुकूलित हैं। आपूर्ति स्रोत बदलने की स्थिति में तकनीकी समायोजन, लॉजिस्टिक पुनर्संरचना और दीर्घकालिक अनुबंधों पर पुनर्विचार आवश्यक होगा।
वहीं दूसरी ओर अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ रणनीतिक संबंधों को भी संतुलित रखना भारत के लिए जरूरी माना जा रहा है। सवाल उठाए जा रहे हैं कि ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक दबाव के बीच नीति संतुलन कैसे बनाया जाएगा। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि भारत अपनी ऊर्जा खरीद नीति राष्ट्रीय हित और आर्थिक व्यावहारिकता के आधार पर तय करता है।
इस बीच वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति विविधीकरण की दिशा में प्रयास जारी हैं। मध्य पूर्व, अफ्रीका और अमेरिका से आयात बढ़ाने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है, लेकिन मूल्य, परिवहन लागत और उपलब्धता जैसे कारक निर्णय को प्रभावित करते हैं।
बताया जा रहा है कि निकट भविष्य में भारत रूसी तेल आयात को पूरी तरह बंद करने के बजाय स्रोतों का संतुलन बनाने की रणनीति पर काम करता रहेगा। ऊर्जा मांग, मूल्य स्थिरता और आपूर्ति सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए चरणबद्ध और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाए जाने की संभावना जताई जा रही है।
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