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भारत की अनोखी ट्रेन, सिग्नल नहीं हाथ इशारे पर रुकती

भारत की अनोखी ट्रेन, सिग्नल नहीं हाथ इशारे पर रुकती

Last Updated Feb - 13 - 2026, 01:39 PM | Source : Fela News

भारत में एक अनोखी ट्रेन है जो लाल सिग्नल से नहीं, बल्कि यात्रियों के हाथ के इशारे पर रुकती है. 124 साल पुरानी यह सेवा आज भी हजारों लोगों की लाइफलाइन बनी हुई है
भारत की अनोखी ट्रेन
भारत की अनोखी ट्रेन

भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक है, जहां हर दिन हजारों ट्रेनें सिग्नल सिस्टम के अनुसार संचालित होती हैं। आधुनिक तकनीक, ऑटोमेटिक सिग्नल और कंट्रोल सिस्टम के जरिए ट्रेनों की आवाजाही नियंत्रित की जाती है। लेकिन इसी विशाल नेटवर्क में एक ऐसी अनोखी ट्रेन भी मौजूद है, जो पारंपरिक सिग्नल सिस्टम पर नहीं, बल्कि यात्रियों के हाथ के इशारे पर रुकती है। यह ट्रेन भारतीय रेलवे की ऐतिहासिक और मानवीय व्यवस्था का एक दुर्लभ उदाहरण मानी जाती है। 

बुंदेलखंड में चलती है यह खास शटल ट्रेन 

यह अनोखी ट्रेन उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में एट जंक्शन और कोंच के बीच संचालित होती है। करीब 13 किलोमीटर लंबे इस छोटे से रूट पर चलने वाली यह शटल सेवा स्थानीय लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह ट्रेन छोटे-छोटे गांवों और कस्बों को जोड़ती है, जहां बड़े स्टेशन या आधुनिक सुविधाएं मौजूद नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग आज भी इस ट्रेन पर अपनी रोजमर्रा की यात्रा के लिए निर्भर हैं। 

100 साल से ज्यादा पुरानी है यह सेवा 

इस ट्रेन की शुरुआत साल 1902 में अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान हुई थी। उस समय इसे स्थानीय परिवहन सुविधा को बेहतर बनाने के लिए शुरू किया गया था। आज 100 साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद यह सेवा लगातार जारी है। इतने लंबे समय में रेलवे में कई बदलाव हुए, लेकिन इस ट्रेन की मूल कार्यप्रणाली आज भी वैसी ही बनी हुई है। यही कारण है कि यह ट्रेन भारतीय रेलवे के इतिहास का एक जीवंत उदाहरण मानी जाती है। 

भारत में एक अनोखी ट्रेन है जो लाल सिग्नल से नहीं, बल्कि यात्रियों के हाथ के इशारे पर रुकती है. 124 साल पुरानी यह सेवा आज भी हजारों लोगों की लाइफलाइन बनी हुई हैइस ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत इसका रुकने का तरीका है। अगर कोई यात्री ट्रैक के पास खड़ा होकर हाथ से इशारा करता है, तो ट्रेन चालक ट्रेन को रोक देता है। यह व्यवस्था खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए बेहद उपयोगी है, क्योंकि कई जगहों पर औपचारिक स्टेशन या सिग्नल मौजूद नहीं हैं। इस सुविधा से यात्रियों को लंबी दूरी तय करने की जरूरत नहीं पड़ती और वे आसानी से ट्रेन का उपयोग कर सकते हैं। 

स्थानीय लोगों के जीवन की लाइफलाइन 

इस ट्रेन में आमतौर पर तीन कोच होते हैं और इसकी गति करीब 30 किलोमीटर प्रति घंटे होती है। यह ट्रेन लगभग 35 से 40 मिनट में पूरे रूट की दूरी तय करती है। किसान अपनी फसल और सब्जियां इसी ट्रेन के जरिए बाजार तक पहुंचाते हैं, जबकि छात्र और छोटे व्यापारी भी अपनी दैनिक यात्रा के लिए इसी पर निर्भर रहते हैं। इस वजह से यह ट्रेन केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन की लाइफलाइन बन चुकी है। 

परंपरा और जरूरत का अनोखा संगम 

आज के आधुनिक दौर में जहां रेलवे पूरी तरह डिजिटल और ऑटोमेटेड हो चुका है, वहीं यह ट्रेन पारंपरिक और मानवीय व्यवस्था की मिसाल पेश करती है। यह सेवा दिखाती है कि तकनीक के साथ-साथ लोगों की जरूरतों और सुविधाओं को भी महत्व दिया जाता है। हाथ के इशारे पर रुकने वाली यह ट्रेन भारतीय रेलवे की विरासत, भरोसे और ग्रामीण भारत की वास्तविक जरूरतों का प्रतीक है। यही कारण है कि यह अनोखी ट्रेन आज भी इतिहास और आधुनिकता के बीच एक मजबूत पुल बनकर लोगों की सेवा कर रही है। 

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