Last Updated Oct - 29 - 2025, 06:31 PM | Source : Fela News
तेजस्वी यादव का MY फार्मूला बनाम अखिलेश का PDA मॉडल — बिहार में बढ़ी सियासी खींचतान।
बिहार में महागठबंधन के भीतर इस वक्त सियासी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। जहां अखिलेश यादव अपने पीडीए फॉर्मूले के जरिए नया सामाजिक समीकरण बनाने में जुटे हैं, वहीं तेजस्वी यादव पुराने MY (मुस्लिम-यादव) फार्मूले को फिर से केंद्र में लाकर अलग राह पकड़ते दिख रहे हैं। यही वजह है कि गठबंधन के भीतर असहजता और अविश्वास दोनों बढ़ने लगे हैं।
तेजस्वी यादव का यह रुख दरअसल उनके पुराने राजनीतिक आधार को मजबूत करने की कोशिश माना जा रहा है। लेकिन इसका असर महागठबंधन की एकता पर दिखने लगा है। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस और वाम दलों को लगता है कि तेजस्वी की यह रणनीति “वोटों का केंद्रीकरण” करने के बजाय “गठबंधन का बिखराव” बढ़ा सकती है। खासतौर पर बिहार में जहां हर जाति समीकरण चुनावी गणित बदल सकता है, वहां तेजस्वी का केवल MY पर निर्भर रहना जोखिम भरा कदम बताया जा रहा है।
अखिलेश यादव के पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फार्मूले से दूरी बनाकर तेजस्वी ने यह संकेत दिया है कि वे उत्तर प्रदेश की तर्ज पर नई सामाजिक इंजीनियरिंग को अपनाने के पक्ष में नहीं हैं। इसके पीछे की वजह शायद यह है कि बिहार में यादव और मुस्लिम वोट पहले से ही RJD के मजबूत आधार माने जाते हैं। मगर बदलते राजनीतिक माहौल में यह सीमित समीकरण अब उतनी व्यापक अपील नहीं रखता, जितनी पहले थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी अगर MY समीकरण पर अड़े रहते हैं, तो महागठबंधन के अन्य दलों के लिए यह “नेतृत्व स्वीकार्यता” का संकट पैदा कर सकता है। कई छोटे दल पहले ही आरोप लगा चुके हैं कि RJD, गठबंधन के भीतर अपनी वर्चस्व की राजनीति चला रही है।
महागठबंधन का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तेजस्वी अपने पुराने फार्मूले से आगे बढ़कर एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ बना पाते हैं या नहीं। अगर नहीं, तो आने वाले चुनावों में यह गठबंधन एक बार फिर अंदरूनी मतभेदों और जातीय राजनीति के बोझ तले कमजोर पड़ सकता है।
बिहार की राजनीति में यह सवाल अब खुला है,तेजस्वी का यह दांव अपनी जमीन बचाने का तरीका है या फिर महागठबंधन के भविष्य पर मंडराता नया खतरा।