Last Updated Feb - 05 - 2026, 11:39 AM | Source : Fela News
आजमगढ़ के 2003 पुलिस हिरासत गोलीकांड मामले में अदालत ने तत्कालीन थानाध्यक्ष को उम्रकैद और जुर्माने की सजा सुनाई। लंबी सुनवाई के बाद 23 साल में आया फैसला |
उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में 23 साल पुराने एक चर्चित पुलिस हिरासत मौत मामले में अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश जय प्रकाश पांडेय की अदालत ने रानी की सराय थाने में तैनात तत्कालीन थानाध्यक्ष जे. के. सिंह को आजीवन कारावास और 1 लाख 5 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है। यह मामला वर्ष 2003 का है, जब एक बैटरी चोरी के आरोप में हिरासत में लिए गए हरिलाल यादव की गोली लगने से मौत हो गई थी।
घटना 29 मार्च 2003 की है। पुलिस ने हरिलाल यादव को बैटरी चोरी के मामले में पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था। उसी दिन उनके पुत्र जितेंद्र यादव अपने रिश्तेदार रामवचन यादव के साथ थाने पहुंचे। आरोप है कि पूछताछ के दौरान थानाध्यक्ष जे. के. सिंह के उकसाने पर दारोगा नरेंद्र बहादुर सिंह ने हरिलाल यादव को गोली मार दी। गोली लगने के बाद उन्हें जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
परिजनों के मुताबिक, घटना के समय मौजूद जितेंद्र यादव और रामवचन यादव को भी हवालात में बंद कर दिया गया था। अगले दिन 30 मार्च को जितेंद्र यादव की तहरीर पर मामला दर्ज किया गया। इस बीच, रानी की सराय थाने में दारोगा नरेंद्र बहादुर सिंह के खिलाफ हत्या का मुकदमा पहले ही दर्ज हो चुका था। बाद में दोनों मामलों को एक साथ जोड़ दिया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सितंबर 2003 में शासन ने इसकी जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी। सीबीसीआईडी ने लंबी जांच के बाद फरवरी 2005 में अदालत में चार्जशीट दाखिल की। मुकदमे की सुनवाई के दौरान आरोपी दारोगा नरेंद्र बहादुर सिंह की मृत्यु हो गई, लेकिन थानाध्यक्ष जे. के. सिंह के खिलाफ मुकदमा चलता रहा।
अभियोजन पक्ष ने अदालत में सात गवाहों को पेश किया। गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और जांच एजेंसियों द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने यह माना कि हिरासत में गोली चलाने की घटना में तत्कालीन थानाध्यक्ष की भूमिका साबित होती है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।
फैसले के बाद पुलिस महानिदेशक अभियोजन दीपेश जुनेजा ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने सभी साक्ष्यों को गंभीरता से अदालत के सामने रखा, जिसके आधार पर न्यायालय ने सख्त सजा सुनाई। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में न्याय सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है, ताकि कानून का राज कायम रहे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
23 साल बाद आए इस फैसले को पीड़ित परिवार के लिए न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह मामला पुलिस हिरासत में मानवाधिकारों की सुरक्षा और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल उठाता रहा है। अदालत के इस निर्णय ने यह संदेश दिया है कि लंबे समय बाद ही सही, लेकिन कानून के सामने हर दोषी को जवाब देना ही पड़ता है।
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