Last Updated May - 07 - 2026, 11:34 AM | Source : Fela News
CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा सवाल उठाया। कोर्ट ने पूछा कि क्या न्यायपालिका संसद को कानून बनाने का निर्देश दे सकती है और क्या ऐसी याचिका स्वीकार की जा सकती है?
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर बुधवार को अहम सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि क्या न्यायपालिका संसद को कानून बनाने का निर्देश दे सकती है और क्या ऐसी मांग वाली याचिका स्वीकार की जा सकती है। यह मामला 2023 के उस कानून की संवैधानिक वैधता से जुड़ा है, जिसमें चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर कर दिया गया था।
केंद्र की सुनवाई टालने की मांग खारिज
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने शुरुआत में ही केंद्र सरकार की सुनवाई टालने की मांग ठुकरा दी। अदालत ने साफ कहा कि यह मामला बेहद महत्वपूर्ण है और इसकी सुनवाई जरूरी है।
कोर्ट ने पूछा- क्या संसद को निर्देश दे सकते हैं?
सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने याचिका में संसद को कानून बनाने का निर्देश देने की मांग पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “क्या अदालत संसद को कानून बनाने के लिए कह सकती है? क्या यह याचिका इस रूप में स्वीकार्य है?” कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या न्यायपालिका द्वारा तय किए गए मानक भविष्य में बनने वाले कानून पर बाध्यकारी हो सकते हैं।
‘अनूप बरनवाल’ फैसले का जिक्र
सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के चर्चित ‘अनूप बरनवाल’ फैसले का भी उल्लेख किया। उस फैसले में संविधान पीठ ने कहा था कि CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI वाली तीन सदस्यीय समिति द्वारा की जाएगी। हालांकि अदालत ने यह व्यवस्था तब तक के लिए लागू की थी, जब तक संसद नया कानून नहीं बना देती।
नए कानून पर सरकार को फायदा देने का आरोप
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने दलील दी कि नए कानून में चयन समिति का ढांचा सरकार को फायदा पहुंचाता है। उनके मुताबिक समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता का होना 2-1 का समीकरण बनाता है, जिससे सरकार अपनी पसंद के उम्मीदवार की नियुक्ति कर सकती है।
कार्यपालिका के नियंत्रण पर बहस तेज
वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि संविधान पीठ के फैसले को सामान्य कानून से नहीं बदला जा सकता। वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों का विरोध किया और कहा कि केवल आलोचना के आधार पर किसी व्यवस्था को बदलना सही नहीं होगा।
अब सबकी नजर अगली सुनवाई पर
इस अहम मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को होगी। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने राजनीतिक और कानूनी हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
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