Last Updated Feb - 07 - 2026, 10:59 AM | Source : Fela News
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अबॉर्शन की अनुमति देना उसके लिए भी आसान नहीं है, लेकिन नाबालिग खुद गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती है।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (6 फरवरी, 2026) को एक अहम फैसले में महिला के प्रजनन अधिकार और उसकी स्वतंत्रता को सबसे ऊपर रखा। कोर्ट ने 30 हफ्तों की गर्भवती एक नाबालिग को मेडिकल अबॉर्शन की अनुमति देते हुए कहा कि किसी महिला, खासकर नाबालिग को उसकी मर्जी के बिना मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुइंया की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग की इच्छा को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए, खासकर जब वह साफ तौर पर गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मायने नहीं रखता कि गर्भ ठहरना रेप के कारण हुआ या सहमति से संबंध बनाने की वजह से। असली सवाल यह है कि लड़की क्या चाहती है। नाबालिग के वकील ने दलील दी कि बच्चे को जन्म देने से उसे सामाजिक बदनामी और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ेगा, जिस पर कोर्ट ने सहमति जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के जेजे हॉस्पिटल को निर्देश दिया कि वह पूरी मेडिकल प्रक्रिया के तहत सुरक्षित तरीके से गर्भपात कराए। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा आदेश देना उनके लिए आसान नहीं है, लेकिन नाबालिग की इच्छा और अधिकार सबसे अहम हैं।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर कानून 24 हफ्तों में अबॉर्शन की अनुमति देता है, तो खास हालात में 30 हफ्तों में भी इसे रोका नहीं जाना चाहिए, खासकर तब जब नाबालिग खुद गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती।
यह भी पढ़े