Last Updated Nov - 26 - 2025, 03:34 PM | Source : Fela News
एक रोग से टूटे व्यक्ति ने सिर्फ एक मंत्र के भरोसे पूरा जीवन ही नहीं बदला, बल्कि कई औरों की जिंदगी का सहारा बन गया।
आरएसएस के 100 साल पूरे होने पर कई कहानियाँ सामने आ रही हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा से निकली यह कहानी सबसे अलग है। सदाशिव काटरे, एक समय कुष्ठ रोग से पीड़ित, शरीर से कमजोर और समाज से दूर, आज 100 एकड़ में फैले एक बड़े कुष्ठ आश्रम के संस्थापक के रूप में जाने जाते हैं। यह आश्रम सिर्फ बीमारी का इलाज नहीं करता, बल्कि समाज में सम्मान और आत्मनिर्भरता से जीने की राह भी दिखाता है।
कहा जाता है कि इलाज के दौरान उन्होंने एक स्वयंसेवक से ‘गुरु मंत्र’ ग्रहण किया, जिसमें बस एक सीख थी, स्वस्थ हो या अस्वस्थ, जीवन का लक्ष्य दूसरों के लिए जीना होना चाहिए। इसी बात ने उनके अंदर नई ऊर्जा पैदा कर दी। बीमारी ठीक होने के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि वे अपना जीवन उन लोगों के लिए समर्पित करेंगे जिन्हें समाज अक्सर नजरअंदाज करता है।
यही सोच आगे चलकर 100 एकड़ के आश्रम का रूप बनी। शुरुआत छोटे कमरे और सीमित संसाधनों से हुई, लेकिन धीरे-धीरे लोग जुड़े, मदद मिली और आज यह जगह कई पीड़ित परिवारों का स्थायी सहारा बन चुकी है। यहाँ इलाज, शिक्षा, रोजगार प्रशिक्षण और रहने की व्यवस्था, सब कुछ एक ही परिसर में मिलता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार सदाशिव काटरे ने न सिर्फ आश्रम बनाया बल्कि रोगियों का आत्मविश्वास भी वापस लौटाया। बहुत-से लोग, जो पहले खुद को समाज से कटे हुए महसूस करते थे, आज यहाँ काम करते हैं, सीखते हैं और सामान्य जीवन जी रहे हैं।
संघ की शताब्दी वर्ष में यह कहानी इसलिए चर्चा में है क्योंकि यह संगठन के सेवा कार्यों के उस पहलू को सामने लाती है जिसे आमतौर पर सार्वजनिक बहस में कम जगह मिलती है। सदाशिव काटरे का जीवन यह साबित करता है कि सेवा का रास्ता सिर्फ सिद्धांतों से नहीं, बल्कि समर्पण और संवेदना से बनता है।
100 एकड़ में खड़ा यह आश्रम सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि एक संदेश है, कभी-कभी सबसे बड़ा बदलाव वही लोग लाते हैं, जिनसे कोई उम्मीद नहीं करता।