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चीन का सख्त संदेश: ईरान पर वार तो बंद होगा एक्सपोर्ट

चीन का सख्त संदेश: ईरान पर वार तो बंद होगा एक्सपोर्ट

Last Updated Feb - 27 - 2026, 11:19 AM | Source : Fela News

अमेरिका-ईरान तनाव के बीच चीन ने चेतावनी दी है कि तेहरान पर हमले की स्थिति में वह अमेरिका को रेयर मेटल की आपूर्ति रोक सकता है, जिससे रक्षा उद्योग प्रभावित होगा ।
ईरान पर वार तो बंद होगा एक्सपोर्ट
ईरान पर वार तो बंद होगा एक्सपोर्ट

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच चीन का रुख अब अधिक स्पष्ट और मुखर नजर आ रहा है। हालिया बयानों में बीजिंग ने संकेत दिया है कि यदि वॉशिंगटन तेहरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करता है, तो चीन रणनीतिक खनिजों— विशेषकर रेयर अर्थ मेटल - की आपूर्ति पर रोक लगाने पर विचार कर सकता है। यह चेतावनी केवल कूटनीतिक बयान नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे वैश्विक शक्ति संतुलन से जोड़कर देखा जा रहा है। 

रेयर अर्थ मेटल आधुनिक तकनीक और रक्षा उद्योग की रीढ़ माने जाते हैं। इनका उपयोग मिसाइल गाइडेंस सिस्टम, स्टेल्थ फाइटर जेट, रडार, ड्रोन, सैटेलाइट कम्युनिकेशन और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में होता है। चीन वैश्विक स्तर पर इन खनिजों के उत्पादन और प्रोसेसिंग में अग्रणी है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय आकलनों के अनुसार, अमेरिका अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा चीन से आयात करता रहा है। ऐसे में यदि सप्लाई बाधित होती है, तो अल्पकालिक प्रभाव रक्षा आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है। 

विश्लेषकों का कहना है कि यह मुद्दा केवल व्यापारिक निर्भरता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक दबाव की राजनीति भी है। अमेरिका और चीन के बीच पहले से ही तकनीकी प्रतिस्पर्धा, सेमीकंडक्टर निर्यात नियंत्रण और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में प्रभाव को लेकर मतभेद मौजूद हैं। अब ईरान के मुद्दे ने इस समीकरण को और जटिल बना दिया है। 

चीन और ईरान के संबंध पिछले दशक में ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के सहयोग के जरिए मजबूत हुए हैं। ईरान, चीन को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल निर्यात करता है। पश्चिम एशिया में संभावित सैन्य टकराव की स्थिति में होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग प्रभावित हो सकते हैं, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा संभालते हैं। चीन, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर है, इस क्षेत्र में स्थिरता को अपने आर्थिक हितों से जोड़कर देखता है। 

दूसरी ओर, अमेरिका ने हाल के वर्षों में रेयर अर्थ सप्लाई को विविधीकृत करने के प्रयास तेज किए हैं। घरेलू उत्पादन बढ़ाने, ऑस्ट्रेलिया और अन्य सहयोगी देशों के साथ साझेदारी तथा वैकल्पिक स्रोत विकसित करने की दिशा में पहल की गई है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने में अभी समय लगेगा। 

अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस घटनाक्रम पर नज़र बनाए हुए है। यदि कूटनीतिक वार्ता सफल होती है, तो तनाव कम हो सकता है लेकिन यदि स्थिति सैन्य टकराव की ओर बढ़ती है, तो इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक बाजार, ऊर्जा कीमतें, रक्षा उद्योग और आपूर्ति शृंखलाएं व्यापक रूप से प्रभावित हो सकती हैं। 

फिलहाल, यह स्पष्ट है कि संसाधन और आपूर्ति श्रृंखलाएं अब वैश्विक कूटनीति का अहम हथियार बन चुकी हैं। चीन की चेतावनी इस बात का संकेत है कि आधुनिक भू-राजनीति में आर्थिक और सामरिक आयाम गहराई से जुड़े हुए हैं। आने वाले दिनों में वार्ता, बयानबाजी और संभावित नीतिगत फैसले तय करेंगे कि यह तनाव किस दिशा में आगे बढ़ता है। 

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