Last Updated Jun - 11 - 2026, 12:52 PM | Source : Fela News
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से भारत की चिंता बढ़ गई है। CTI ने चेतावनी दी है कि इससे कच्चे तेल की कीमतों, आयात लागत और महंगाई पर बड़ा असर पड़ सकता है, जिससे आम लोगों और कारोबारियों दोनों पर दबाव बढ़ेगा।
पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान टकराव के बीच एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की चिंता बढ़ा दी है। ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद किए जाने की खबरों के बाद भारत के प्रमुख व्यापारिक संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) ने गंभीर आशंका जताई है। व्यापार जगत का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो भारत को तेल, व्यापार, परिवहन और महंगाई के मोर्चे पर बड़ा झटका लग सकता है।
1970 के बाद सबसे बड़े ऊर्जा संकट की आशंका
CTI चेयरमैन बृजेश गोयल ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक बंद रहता है, तो दुनिया 1970 के दशक के बाद सबसे बड़े ऊर्जा संकट का सामना कर सकती है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होती है। ऐसे में तेल की आपूर्ति प्रभावित होने पर वैश्विक बाजार में कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
उन्होंने कहा कि भारत, चीन और रूस जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर इसका सीधा असर पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल महंगे होने से ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है, जिसका बोझ आखिरकार आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।
महंगाई दर 5 प्रतिशत के पार जाने का खतरा
CTI के महासचिव रमेश आहूजा और वरिष्ठ उपाध्यक्ष दीपक गर्ग का कहना है कि भारत में खुदरा महंगाई दर अभी नियंत्रित स्थिति में है, लेकिन अगर तेल संकट गहराता है तो महंगाई का नया दौर शुरू हो सकता है। उनका अनुमान है कि मार्च-अप्रैल में 3.4 प्रतिशत के आसपास रही महंगाई दर 5 प्रतिशत से ऊपर पहुंच सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ईंधन महंगा होने से खाद्य पदार्थ, कपड़े, गैस, बिजली, परिवहन और होटल-रेस्टोरेंट सेवाओं की लागत में भी तेजी से बढ़ोतरी हो सकती है।
भारत को चार बड़े मोर्चों पर झटका
सबसे बड़ा असर ऊर्जा क्षेत्र पर देखने को मिल सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आयात करता है। होर्मुज के बंद होने से कच्चे तेल और LNG की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है, जिससे देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर जा सकती हैं।
एविएशन, उद्योग और खेती पर भी असर
तेल महंगा होने का असर सिर्फ वाहनों तक सीमित नहीं रहेगा। विमानन क्षेत्र में एयर टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमत बढ़ने से हवाई यात्रा महंगी हो सकती है। पेंट, टायर, प्लास्टिक और पेट्रोकेमिकल उद्योगों की उत्पादन लागत भी बढ़ सकती है।
इसके अलावा LNG महंगी होने से उर्वरक उत्पादन प्रभावित होगा, जिससे खेती की लागत बढ़ने और खाद्य महंगाई में उछाल आने की आशंका है। शिपिंग और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में भी माल ढुलाई का खर्च कई गुना बढ़ सकता है।
रणनीतिक सुरक्षा और व्यापार पर बढ़ेगा दबाव
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के पास सीमित अवधि के लिए रणनीतिक तेल भंडार मौजूद हैं, लेकिन लंबे समय तक संकट रहने पर चुनौती बढ़ सकती है। अरब सागर में भारतीय नौसेना की सक्रिय तैनाती के बावजूद युद्ध जैसी स्थिति में जहाजों का बीमा और परिवहन लागत कई गुना बढ़ सकती है।
भारत का महत्वाकांक्षी चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट भी इस क्षेत्र में स्थित होने के कारण प्रभावित हो सकता है, जिससे व्यापारिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
क्या भारत के पास बचाव का रास्ता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत रूस सहित अन्य देशों से तेल आयात बढ़ाने की कोशिश कर सकता है, लेकिन यह पूरी जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। अमेरिका, ब्राजील और गुयाना जैसे देशों से तेल मंगाने का विकल्प मौजूद है, लेकिन वहां से सप्लाई आने में अधिक समय और ज्यादा लागत लग सकती है।
फिलहाल बाजार की नजर पश्चिम एशिया के हालात पर टिकी हुई है। अगर तनाव जल्द नहीं थमा, तो इसका असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम आदमी की रसोई से लेकर पूरे देश की अर्थव्यवस्था तक महसूस किया जा सकता है।
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