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कम उम्र में स्मार्टफोन बना बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का खतरा

कम उम्र में स्मार्टफोन बना बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का खतरा

Last Updated Jan - 19 - 2026, 01:43 PM | Source : Fela News

नई स्टडी में खुलासा, 12 साल से पहले मोबाइल मिलने से बच्चों में डिप्रेशन, नींद की कमी, मोटापा और व्यवहार संबंधी समस्याओं का जोखिम तेजी से बढ़ता है.
कम उम्र में स्मार्टफोन बना बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का खतरा
कम उम्र में स्मार्टफोन बना बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का खतरा

आज के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन हर घर का हिस्सा बन चुका है. जहां बड़े लोग अपने काम और मनोरंजन के लिए मोबाइल पर निर्भर हैं, वहीं अब छोटे बच्चों के हाथों में भी यह तेजी से पहुंच रहा है. कई माता-पिता बच्चों को चुप कराने, खाना खिलाने या व्यस्त रखने के लिए उन्हें मोबाइल थमा देते हैं. लेकिन हाल ही में सामने आई एक नई रिसर्च इस आदत को बेहद खतरनाक बता रही है.

Pediatrics जर्नल में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय स्टडी के अनुसार, जिन बच्चों को 12 साल से कम उम्र में स्मार्टफोन मिल जाता है, उनमें मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. शोध में पाया गया कि कम उम्र में मोबाइल के संपर्क में आने वाले बच्चों में डिप्रेशन, एंग्जायटी, नींद की कमी और मोटापे की समस्या ज्यादा देखी गई.

विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चे जब लंबे समय तक स्क्रीन पर रहते हैं तो उनका दिमाग लगातार तेज रोशनी और डिजिटल कंटेंट से प्रभावित होता है. इससे ब्रेन के डेवलपमेंट पर असर पड़ता है. छोटे बच्चों का दिमाग तेजी से विकसित हो रहा होता है और उन्हें वास्तविक दुनिया में खेल, बातचीत और सीखने की जरूरत होती है. लेकिन मोबाइल के कारण वे वर्चुअल दुनिया में उलझ जाते हैं, जिससे उनकी सामाजिक और भावनात्मक क्षमता कमजोर होने लगती है

स्टडी में यह भी सामने आया कि मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल करने वाले बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो जाती है. वे चिड़चिड़े हो जाते हैं और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगते हैं. कई बच्चों में आक्रामक व्यवहार और अकेलेपन की भावना भी बढ़ती देखी गई.

नींद पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है. मोबाइल की ब्लू लाइट मेलाटोनिन हार्मोन को प्रभावित करती है, जो नींद लाने के लिए जिम्मेदार होता है. नतीजा यह होता है कि बच्चे देर रात तक जागते रहते हैं और उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती. कम नींद का असर सीधे दिमाग और शरीर पर पड़ता है. इससे मोटापा, थकान और पढ़ाई में कमजोरी जैसी समस्याएं बढ़ती हैं.

बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि 2 से 5 साल के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम दिन में एक घंटे से ज्यादा नहीं होना चाहिए, जबकि 6 से 12 साल के बच्चों के लिए भी सीमित और निगरानी में ही मोबाइल का इस्तेमाल होना चाहिए.

माता-पिता की भूमिका यहां सबसे महत्वपूर्ण है. बच्चों को मोबाइल देने के बजाय उन्हें आउटडोर खेल, किताबें, ड्राइंग, पजल्स और पारिवारिक बातचीत में शामिल करना ज्यादा जरूरी है. टेक्नोलॉजी से पूरी तरह दूर रखना संभव नहीं है, लेकिन उसका संतुलित और नियंत्रित उपयोग ही बच्चों के बेहतर भविष्य की कुंजी है.

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