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24 अकबर रोड बंगला विवाद गरमाया, 2006 पॉलिसी से कांग्रेस पर बड़ा एक्शन क्यों?

24 अकबर रोड बंगला विवाद गरमाया, 2006 पॉलिसी से कांग्रेस पर बड़ा एक्शन क्यों?

Last Updated Mar - 26 - 2026, 01:42 PM | Source : Fela News

कांग्रेस को 13 मार्च को बंगला खाली करने का नोटिस मिला है। पार्टी नेता के मुताबिक, इस फैसले के खिलाफ कोर्ट जाने पर विचार हो रहा है। वहीं 2006 की नीति के तहत सरकार को आवंटित बंगला खाली कराने का अधिकार है।
2006 पॉलिसी से कांग्रेस पर बड़ा एक्शन क्यों?
2006 पॉलिसी से कांग्रेस पर बड़ा एक्शन क्यों?

केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच एक बार फिर टकराव की स्थिति बनती नजर आ रही है। इस बार विवाद सरकारी बंगलों को खाली करने के नोटिस को लेकर है। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक, केंद्र ने पार्टी को दो नोटिस भेजकर 28 मार्च तक 24 अकबर रोड स्थित मुख्यालय और 5 रायसीना रोड स्थित इंडियन यूथ कांग्रेस ऑफिस खाली करने को कहा है।

कांग्रेस का कहना है कि ये नोटिस 13 मार्च को भेजे गए थे और पार्टी इस फैसले के खिलाफ अदालत जाने पर विचार कर रही है। हालांकि, सरकार की ओर से यह कार्रवाई 2006 की नीति के आधार पर की जा रही है। इस नीति के तहत राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को ऑफिस के लिए जमीन आवंटित की जाती है, लेकिन नई जमीन मिलने के बाद उन्हें तय समय में पुराने सरकारी बंगले खाली करना होता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, कांग्रेस को दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर जमीन दी गई थी, जहां ‘इंदिरा भवन’ नाम से नया मुख्यालय बनकर 2025 में तैयार हुआ। इसके बावजूद पार्टी ने 24 अकबर रोड और 5 रायसीना रोड स्थित पुराने कार्यालय खाली नहीं किए हैं। जानकारी के मुताबिक, इन बंगलों का आवंटन 26 जून 2013 को ही रद्द कर दिया गया था।

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि कांग्रेस को दिए गए तीन टाइप-8 बंगलों में से एक 26 अकबर रोड पहले ही खाली किया जा चुका है, लेकिन बाकी दो जगहों पर अब तक कब्जा बना हुआ है। यही वजह है कि अब केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाते हुए नोटिस जारी किए हैं।

इस मामले में भारतीय जनता पार्टी का भी उदाहरण सामने आया है। बीजेपी ने भी 2017 में आवंटन रद्द होने के बाद कुछ समय तक 11 अशोक रोड स्थित अपना पुराना कार्यालय बनाए रखा था। बाद में 2018 में नया मुख्यालय बनने के बाद पार्टी वहां शिफ्ट हो गई थी।

2006 की नीति के अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल को नई जमीन मिलने के बाद अधिकतम तीन साल के भीतर पुराने सरकारी बंगले खाली करने होते हैं। साथ ही जमीन के लिए प्रीमियम और सालाना किराया भी देना होता है। यदि शर्तों का पालन नहीं किया जाता, तो आवंटन रद्द किया जा सकता है।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह नियम सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होता है और इसी के तहत अब कार्रवाई की जा रही है। इस मुद्दे पर आगे क्या कानूनी और राजनीतिक मोड़ आता है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।

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