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दिल्ली अक्षरधाम में 108 फीट नीलकंठ मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा, भव्य आयोजन से देश स्तब्ध

दिल्ली अक्षरधाम में 108 फीट नीलकंठ मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा, भव्य आयोजन से देश स्तब्ध

Last Updated Mar - 26 - 2026, 01:17 PM | Source : Fela News

Pran Pratishtha Swaminarayan 108 feet Statue: अक्षरधाम मंदिर में आज भगवान स्वामीनारायण की 108 फीट ऊंची प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा होगी। भव्य आयोजन के लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है।
दिल्ली अक्षरधाम में 108 फीट नीलकंठ मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा
दिल्ली अक्षरधाम में 108 फीट नीलकंठ मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा

नई दिल्ली स्थित स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर में आज भगवान स्वामीनारायण के युवा स्वरूप नीलकंठ वर्णी की 108 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की जाएगी। इस भव्य आयोजन के लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और देश-विदेश से श्रद्धालु व संत इसमें शामिल हो रहे हैं।

यह प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम वैश्विक BAPS संस्था के प्रमुख महंत स्वामी महाराज के सान्निध्य में आयोजित किया जा रहा है। इस मौके पर तपोमूर्ति नीलकंठ वर्णी की प्रतिमा को विधि-विधान के साथ स्थापित किया जाएगा।

खास है यह विशाल प्रतिमा

यह प्रतिमा पांच धातुओं से बनाई गई है और इसे दुनिया की अनोखी मूर्तियों में गिना जा रहा है। इसकी सबसे खास बात यह है कि यह प्रतिमा एक पैर पर खड़ी है, जो भगवान के कठिन तप और त्याग का प्रतीक है। यह मूर्ति भक्ति और साधना की एक अद्भुत मिसाल पेश करती है।

दुनियाभर से पहुंचे संत और श्रद्धालु

इस भव्य समारोह में शामिल होने के लिए यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों से करीब 300 संत और महंत दिल्ली पहुंचे हैं। आयोजन को लेकर मंदिर परिसर में खास सजावट और सुरक्षा व्यवस्था की गई है

कार्यक्रम से पहले हुए कई आयोजन

महंत स्वामी महाराज 19 मार्च को दिल्ली पहुंचे थे। उनके स्वागत के लिए 21 मार्च को विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसके बाद 22 मार्च को पंचकुला और कुरुक्षेत्र में नवनिर्मित BAPS मंदिरों में भी मूर्ति प्रतिष्ठा कार्यक्रम आयोजित किए गए।

नीलकंठ वर्णी की आध्यात्मिक यात्रा

भगवान स्वामीनारायण को ही नीलकंठ वर्णी के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने मात्र 11 साल की उम्र में घर छोड़ दिया था और करीब 7 वर्षों तक भारतभर में कठिन यात्रा की। इस दौरान उन्होंने 12,000 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की।

अपनी इस आध्यात्मिक यात्रा में उन्होंने हिमालय, बद्रीनाथ, केदारनाथ, कैलाश मानसरोवर, नेपाल का मुक्तिनाथ, असम का कामाख्या मंदिर, रामेश्वरम, पुरी जगन्नाथ धाम, नासिक, पंढरपुर और द्वारका जैसे प्रमुख तीर्थों का भ्रमण किया। इसी तपस्या और यात्रा के कारण उन्हें नीलकंठ वर्णी नाम मिला।

आस्था और परंपरा का संगम

यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और आध्यात्मिकता का एक बड़ा उत्सव है। लाखों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने के लिए उत्साहित हैं।

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