Last Updated Dec - 09 - 2025, 04:37 PM | Source : Fela News
“150 साल का वंदे मातरम्, लेकिन इसकी आत्मा में बसता है हजारों साल पुराना वैदिक विचार”
150 साल पुराना यह गीत सिर्फ आज़ादी की लड़ाई का प्रतीक नहीं, बल्कि उससे भी कहीं पुराने वैदिक दर्शन और भारतीय संस्कृति की spirit को अपने भीतर समेटे हुए है।
वंदे मातरम् का जन्म आधुनिक भारत में जरूर हुआ, लेकिन इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं. बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने जब यह रचना की, तब उनके शब्दों में सिर्फ राष्ट्रभक्ति नहीं, बल्कि उस वैदिक परंपरा की गूंज भी थी जिसमें धरती को “माता” का दर्जा दिया गया है. वैदिक साहित्य में पृथ्वी को जीवनदाता और संरक्षक माना गया है. यही वह भाव था जिसने आगे चलकर इस गीत को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा बना दिया।
वेदों में ‘पृथा’, ‘भूमि’, ‘वसुधा’ जैसे नामों से धरती का सम्मान मिलता है. मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते को पवित्र माना गया, और इस धरती को पालन करने वाली माता के रूप में देखा गया. पुराणों में भी भारतभूमि को देवी के रूप में वर्णित किया गया है. यह वही विचारधारा है जिसने वंदे मातरम् को केवल एक गीत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बना दिया।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब यह गीत पहली बार गूंजा, तब इसके शब्दों ने लोगों में मातृभूमि के लिए त्याग, समर्पण और गर्व की भावना जगाई. अनेक क्रांतिकारियों ने इसे अपनी प्रेरणा का स्रोत कहा. यह गीत लोगों को जोड़ता गया, क्योंकि इसमें राष्ट्र को माता मानने का वही पुरातन भाव था जो सदियों से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है।
दक्षिण एशियाई परंपराओं में यह विश्वास गहरा रहा कि भूमि सिर्फ भू-भाग नहीं है, बल्कि एक जीवित शक्ति है. इसी विचार का आधुनिक रूप वंदे मातरम् में दिखता है, जहां धरती हरी-भरी खेतों, नदियों, ऋतुओं और सौंदर्य के रूप में जीवंत होती है. यही कारण है कि यह गीत हर युग में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखता है।
आज, 150 साल बाद भी यह पंक्ति, “वंदे मातरम्” सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि वैदिक दर्शन से लेकर आधुनिक राष्ट्रवाद तक की एक लंबी सांस्कृतिक यात्रा का प्रतीक है. यह हमें याद दिलाता है कि भारत की धरती को माता मानने का विचार नया नहीं, बल्कि हजारों साल पुरानी हमारी सभ्यता का मूल है।
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