Last Updated Aug - 07 - 2025, 04:24 PM | Source : Fela News
सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका ठुकराते हुए इन-हाउस जांच और CJI की सिफारिश को वैध ठहराया, न्यायपालिका में पारदर्शिता की दी दलील।
सुप्रीम कोर्ट ने आज जस्टिस यशवंत वर्मा (आलाहाबाद हाई कोर्ट) की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रही 'कैश‑एट‑होम' मामले में स्थापित जस्टिस जांच समिति की वैधता तथा तत्कालीन CJI संजीव खन्ना द्वारा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को की गई सिफारिश को चुनौती दी थी ।
संबंधित बेंच, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं A.G. Masih, ने स्पष्ट किया कि यह याचिका उस आधार पर ही स्वीकार्य नहीं है क्योंकि जस्टिस वर्मा पहले जांच समिति में शामिल हुए, फिर बाद में उसकी वैधता पर सवाल उठाया; यह व्यवहार "आश्वस्तिदायक नहीं" माना गया ।
सुप्रीम कोर्ट ने छह मुख्य बिंदुओं पर स्पष्ट रुख अपनाया:
1. अधिकारिता (Maintainability) – जांच प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका योग्य नहीं मानी जा सकती।
2. कानूनी प्रक्रिया – इन-हाउस जांच की वैधानिकता संविधान के अंतर्गत सुरक्षित है; यह कोई अतिरिक्त या अव्यवस्थित प्रणाली नहीं
3. मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं – अदालत ने पाया कि याचिका में वर्मा के मूल अधिकारों का उल्लंघन सिद्ध नहीं हुआ
4. प्रक्रियात्मक अनुपालन – समिति और CJI ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया; केवल वीडियो / तस्वीरें अपलोड नहीं की गईं, लेकिन यह जरूरी नहीं था और समय पर सवाल भी नहीं उठाया गया।
5. कार्यवाही का संवैधानिक स्वरूप – रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजना संवैधानिक रूप से सही था ।
6. भविष्य में अवसर – कोर्ट ने वर्मा को भविष्य में उपयुक्त माध्यमों से अपनी आपत्तियाँ उठाने का रास्ता खुला छोड़ा ।
यह निर्णय स्पष्ट संकेत है कि न्यायपालिका भ्रष्टाचार के आरोपों के मामलों में आंतरिक जांच को बहुत गंभीरता से लेती है और न्यायिक जवाबदेही के लिए तैयार है। अब इस मामले की अगली भूमिका संसद द्वारा संभावित महाभियोग प्रक्रिया (impeachment proceedings) में देखने को मिल सकती है।
इस माहौल में यह फैसला न्यायपालिकीय पारदर्शिता को समर्थन देने वाला माना जा रहा है, जहां निष्पक्षता और कानूनी प्रक्रिया को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।