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बच्चे सबूत नहीं हैं! सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, मनोवैज्ञानिक परीक्षण पर सख्त रुख

बच्चे सबूत नहीं हैं! सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, मनोवैज्ञानिक परीक्षण पर सख्त रुख

Last Updated Jun - 12 - 2026, 12:53 PM | Source : Fela News

सुप्रीम कोर्ट ने बाल पीड़ितों की सुरक्षा को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्हें सिर्फ साक्ष्य का साधन नहीं माना जा सकता. अदालतों को मनोवैज्ञानिक परीक्षण के मामलों में न्यूनतम हस्तक्षेप का सिद्धांत अपनाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के अधिकारों और मानसिक सुरक्षा को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि कस्टडी और मुलाकात अधिकारों से जुड़े विवादों में बच्चों को सिर्फ साक्ष्य जुटाने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता. अदालत ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के परस्पर विरोधी दावों को साबित करने के लिए नाबालिगों का मनोवैज्ञानिक या मनोरोग संबंधी परीक्षण मनमाने ढंग से नहीं कराया जा सकता.

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि किसी भी बच्चे का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन तभी कराया जाना चाहिए जब उसकी स्पष्ट और ठोस आवश्यकता हो. अदालतों को ऐसे मामलों में “न्यूनतम हस्तक्षेप और न्यूनतम संपर्क” के सिद्धांत का पालन करना होगा, ताकि बच्चे पर अनावश्यक मानसिक दबाव न पड़े.

बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश में किया संशोधन

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश में भी संशोधन किया, जिसमें चार सदस्यीय विशेषज्ञ समिति को एक नाबालिग लड़की का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन करने की अनुमति दी गई थी. यह मामला उस लड़की से जुड़ा था, जिसके पिता पर पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत यौन शोषण के आरोप लगे थे.

‘समाज की आत्मा बच्चों के साथ व्यवहार में दिखती है’

अपने 65 पन्नों के फैसले में जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह ने दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है.

अदालत ने कहा कि किसी बाल पीड़ित का मूल्यांकन केवल इसलिए नहीं कराया जा सकता क्योंकि माता-पिता के बीच कस्टडी या मुलाकात अधिकार को लेकर विवाद चल रहा है. हर मामले में अदालत को पहले यह बताना होगा कि परीक्षण क्यों जरूरी है और उसका उद्देश्य क्या है.

गोपनीयता को लेकर भी सख्त निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की पहचान, मेडिकल रिकॉर्ड, मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट और मूल्यांकन के दौरान किए गए खुलासों को पूरी तरह गोपनीय रखने के निर्देश दिए हैं. अदालत ने कहा कि ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग और चिकित्सीय सामग्री सामान्य तौर पर पक्षकारों को सीधे उपलब्ध नहीं कराई जाएगी.

क्या था पूरा मामला?

मामला एक दंपति के बीच कस्टडी विवाद से जुड़ा था. मां ने आरोप लगाया था कि अमेरिका में रहने के दौरान पिता ने बेटी का यौन शोषण किया. भारत लौटने के बाद पिता के खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत मामला दर्ज हुआ, जबकि पिता ने आरोपों को वैवाहिक विवाद से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया.

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि बच्चे की भावनात्मक स्थिरता, मानसिक सुरक्षा, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य ही उसके कल्याण के सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं और अदालतों को हर निर्णय में इन्हें सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए.

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