Last Updated Jan - 24 - 2026, 04:20 PM | Source : Fela News
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद के बाद अलग-अलग धर्म गुरुओं के रुख सामने आए हैं, निश्चलानंद सरस्वती की चेतावनी और बाबा रामदेव की प्रतिक्रिया ने बहस त
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े हालिया विवाद के बाद देश के संत समाज और धार्मिक संगठनों में मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। इस मुद्दे पर अलग-अलग धर्म गुरुओं के बयान सामने आए हैं, जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि धार्मिक नेतृत्व के भीतर भी इस विषय पर एकराय नहीं है। सूत्रों के अनुसार, विवाद की जड़ कुछ सार्वजनिक बयानों और धार्मिक परंपराओं से जुड़े मतभेदों को माना जा रहा है।
इस बीच, पुरी शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने इस मामले को लेकर सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने बिना किसी का नाम लिए चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि सनातन परंपरा और शास्त्रों की मर्यादा के खिलाफ किसी भी तरह का वक्तव्य स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनके बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि संत समाज के एक वर्ग में अविमुक्तेश्वरानंद के विचारों को लेकर गंभीर असहमति है।
वहीं दूसरी ओर, कुछ संत और धार्मिक नेता अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में भी सामने आए हैं। उनका कहना है कि विचारों की अभिव्यक्ति को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और पूरे मामले को अनावश्यक रूप से तूल दिया जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि यह एक वैचारिक मतभेद है, जिसे संवाद के जरिए सुलझाया जाना चाहिए।
योग गुरु बाबा रामदेव की प्रतिक्रिया भी इस विवाद में अहम मानी जा रही है। बाबा रामदेव ने कहा कि संत समाज में मतभेद कोई नई बात नहीं है, लेकिन ऐसे मुद्दों पर संयम और मर्यादा बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म की ताकत उसकी विविधता और आपसी संवाद में है, न कि सार्वजनिक टकराव में।
इस बीच, धार्मिक संगठनों और अखाड़ों के भीतर भी इस विषय पर बैठकों और चर्चाओं का दौर जारी है। सूत्रों के अनुसार, कुछ संत इस विवाद को शांत करने की कोशिश में हैं, जबकि कुछ इसे सिद्धांतों से जुड़ा गंभीर मुद्दा मान रहे हैं। सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या यह विवाद केवल व्यक्तियों तक सीमित रहेगा या इसका असर बड़े धार्मिक मंचों पर भी दिखेगा।
फिलहाल, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से इस पूरे विवाद पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में संत समाज की ओर से कोई सामूहिक रुख सामने आ सकता है। तब तक यह मामला धार्मिक और वैचारिक बहस के केंद्र में बना हुआ है।
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