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यूपी विभाजन की मांग, राज्य बनाने की अनुमति किससे लेनी होती है?

यूपी विभाजन की मांग, राज्य बनाने की अनुमति किससे लेनी होती है?

Last Updated Jan - 22 - 2026, 01:45 PM | Source : Fela News

उत्तर प्रदेश को बांटने की मांग एक बार फिर चर्चा में है. आइए समझते हैं कि नया राज्य कैसे बनाया जाता है और इसकी मंजूरी किससे ली जाती है.
यूपी विभाजन की मांग
यूपी विभाजन की मांग

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है — सबसे ज्यादा आबादी, सबसे ज्यादा सांसद और उतनी ही ज्यादा प्रशासनिक चुनौतियां. लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि क्या इतना बड़ा राज्य एक साथ सही ढंग से चलाया जा सकता है? अब एक बार फिर राज्य को अलग-अलग हिस्सों में बांटने की मांग तेज हो गई है. पश्चिमी यूपी के बाद अब पूर्वांचल से भी अलग राज्य की आवाज उठी है. सवाल है — क्या यूपी का बंटवारा संभव है और इसके लिए किससे अनुमति लेनी होती है?

यूपी बंटवारे की मांग फिर क्यों उठी?

उत्तर प्रदेश को बांटने की मांग नई नहीं है. समय-समय पर अलग-अलग इलाकों से यह मांग उठती रही है. हाल के महीनों में पश्चिमी यूपी में भाजपा के कुछ नेताओं ने छोटे राज्य की जरूरत पर बात की. अब अमेठी से पूर्वांचल राज्य की मांग खुलकर सामने आई है. एक कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय सिंह और पूर्व मंत्री डॉ. अमीता सिंह ने कहा कि पूर्वांचल का विकास तभी संभव है, जब उसे अलग राज्य बनाया जाए. बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने दिखाया कि यह मुद्दा जनता से भी जुड़ा है.

पूर्वांचल को अलग राज्य बनाने की दलील क्या है?

समर्थकों का कहना है कि पूर्वांचल का विकास पश्चिमी और मध्य यूपी की तुलना में धीमा रहा है. शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और रोजगार के मामले में यह इलाका पीछे माना जाता है. उनका तर्क है कि अलग राज्य बनने से प्रशासन ज्यादा ध्यान दे पाएगा और योजनाएं तेजी से लागू होंगी.

क्या राज्य को बांटना आसान है?

राज्य का बंटवारा आसान नहीं होता. इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करनी होती है. यह फैसला भावनाओं पर नहीं, बल्कि कानून के तहत लिया जाता है.

संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को अधिकार है कि वह किसी राज्य का क्षेत्र घटा-बढ़ा सके, नया राज्य बना सके या राज्यों का विलय कर सके. यानी अंतिम फैसला संसद का होता है.

राज्य विधानसभा की भूमिका क्या होती है?

जब किसी राज्य को बांटने का प्रस्ताव आता है, तो राष्ट्रपति उसे संबंधित राज्य की विधानसभा को राय के लिए भेजते हैं. विधानसभा अपनी राय देती है, लेकिन यह बाध्यकारी नहीं होती. यानी संसद चाहे तो विधानसभा की सहमति के बिना भी कानून बना सकती है, हालांकि व्यवहार में विधानसभा की राय को अहम माना जाता है.

जनता से राय क्यों ली जाती है?

राज्य बंटवारे का सीधा असर वहां के लोगों पर पड़ता है. इसलिए सरकार जनता, सामाजिक संगठनों और अन्य पक्षों से भी सलाह लेती है, ताकि यह पता चल सके कि मांग केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि जनसमर्थन वाली है.

संसद में कानून कैसे पास होता है?

राज्य गठन से जुड़ा विधेयक लोकसभा और राज्यसभा में पेश किया जाता है. इसे पारित करने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत होती है, न कि संविधान संशोधन जैसा विशेष बहुमत.

राष्ट्रपति की मंजूरी क्यों जरूरी है?

संसद से कानून पास होने के बाद उसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिलती है. इसके बाद अधिसूचना जारी होती है और नया राज्य कानूनी रूप से अस्तित्व में आ जाता है.

पहले भी बन चुके हैं नए राज्य

भारत में पहले भी कई नए राज्य बने हैं. साल 2000 में उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड बने. 2014 में तेलंगाना का गठन हुआ. इन उदाहरणों से साफ है कि यदि राजनीतिक इच्छा हो और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी की जाए, तो नया राज्य बनना संभव है.

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